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बंगाल: 40% दिव्यांगता और 9 ऑपरेशन के बावजूद कराए 2000 प्रसव, पढ़िए 'साइकिल वाली दीदी' की कहानी

By Manoj Kumar ThakurEdited By: Shubham Tiwari
Published: Sun, 02 Aug 2026 02:37 PM (IST)

जलपाईगुड़ी की 'साइकिल वाली दीदी' गीता कर्मकार को राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया। उन्होंने 2000 से अधिक गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव में मदद की है।

साइकिल वाली दीदी के राष्ट्रीय सम्मान की कहानी

साइकिल वाली दीदी के राष्ट्रीय सम्मान की कहानी

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मनोज कुमार ठाकुर, सिलीगुड़ी। किसी इंसान की पहचान उसके पद से नहीं, उसके काम से होती है। बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के बेलाकोबा की रहने वाली गीता कर्मकार इसकी जीवंत मिसाल हैं। उनको यहां के लोग साइकिल वाली दीदी के नाम से जानते हैं, क्योंकि वह साइकिल से ग्रामीण क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं तक पहुंचती थीं और प्रसव कराने में मदद करती थीं।

1983 से अब तक उन्होंने दो हजार से अधिक गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाकर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कराया। 40 प्रतिशत दिव्यांगता, नौ बड़े ऑपरेशन और निजी जीवन के अनेक संघर्षों के बावजूद वह सेवा से कभी पीछे नहीं हटीं।

चार दशक तक दूर-दराज के चाय बागानों और गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने वाली गीता कर्मकार को उनके असाधारण योगदान के लिए राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया।

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22 जनवरी 1964 को जन्मी गीता कर्मकार का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। मां दूसरों के घरों में काम करके परिवार का पालन-पोषण करती थीं। 1977 में पिता का निधन हो गया था। आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। 12वीं कक्षा पास करते ही उनको स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई। 1985 में उनका विवाह युगल किशोर कर्मकार से हुआ, जो स्वयं समर्पित स्वास्थ्यकर्मी रहे हैं।

1983 में गीता की पहली नियुक्ति बेलाकोबा के डेंगुआझाड़ चाय बागान क्षेत्र में हुई। वहां ज्यादातर लोग गरीब थे। स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और संस्थागत प्रसव के प्रति जागरूकता बहुत कम थी। सड़कें खराब थीं और अस्पताल करीब 12 किलोमीटर दूर। गांव वाले अस्पताल जाने से डरते थे।

ऐसे माहौल में गीता ने घर-घर जाकर लोगों को टीकाकरण व सुरक्षित प्रसव को लेकर जागरूक किया। उन्होंने शत-प्रतिशत टीकाकरण अभियान सफल बनाया और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचाने का जिम्मा खुद उठाया।

शरीर ने साथ देना कम किया, पर सेवा का जज्बा और मजबूत हो गया

2008 में सड़क दुर्घटना में गीता दिव्यांग हो गईं। 2015 में पति के साथ स्कूटर से लौटते समय एक बच्चे को बचाने के प्रयास में फिर गंभीर दुर्घटना हुई। नौ ऑपरेशन हुए और डाक्टरों ने लंबे आराम की सलाह दी, लेकिन गीता ने हार नहीं मानी। शरीर ने साथ देना कम कर दिया, पर सेवा का जज्बा और मजबूत हो गया।

गीता ने परंपरा को बढ़ाया आगे

31 जनवरी, 2026 को गीता स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त हुईं। कुछ ही महीनों बाद 12 मई 2026 को उन्हें देश के सर्वोच्च नर्सिंग सम्मान से नवाजा गया। जलपाईगुड़ी जिले के स्वास्थ्यकर्मियों का फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार पाने का गौरवशाली इतिहास रहा है। 2019 में अरूपा साहा, 2020 में सुनीता दत्त, 2023 में अविस्मिता घोष और पहले गौरी लामा को भी यह सम्मान मिल चुका है। गीता ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।


गीता कर्मकार ने चार दशकों तक बेहद समर्पण के साथ सेवा दी। सेवानिवृत्ति के बाद राष्ट्रपति के हाथों उनको पुरस्कार मिलना पूरे जिले और स्वास्थ्य विभाग के लिए गर्व की बात है।
- डा. असीम हलदार, मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी, जलपाईगुड़ी