सिलीगुड़ी,जागरण संवाददाता। चैत्र नवरात्रि के सिद्धिदात्री मां दुर्गा का नौवां स्वरूप का पूजन किया गया। शहर के दार्जिलिंगमोड़ स्थिति नवग्रह मंदिर में इस वर्ष पुजारियों के द्वारा ही कलश स्थापन कर पूजा की जा रही है। मंदिर के पुजारी पंडित ध्रुव उपाध्याय ने बताया कि सिद्धिदात्री का अर्थ है सिद्धि देने वाली मां। मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से हमें आठ प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

भगवान शिव के द्वारा महाशक्ति की पूजा करने पर मां शक्ति ने प्रसन्न होकर उन्हें यह आठों सिद्धियां प्रदान की थी। यह मां दुर्गा का अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप है। देवी दुर्गा का यह रूप समस्त देवताओं के तेज से प्रकट हुआ है। असुर महिषासुर के अत्याचार से परेशान होकर सब देवगण भगवान भोलेनाथ एवं विष्णु भगवान के समक्ष सहायता हेतु गए। तब वहां उपस्थित सभी देवगणों से एक-एक तेज उत्पन्न हुआ। उस तेज से एक दिव्य शक्ति का निर्माण हुआ। जिन्हें सिद्धिदात्री के नाम से जाना गया।

यह मां का प्रचंड रूप है, जिसमे शत्रु विनाश करने की अदम्य ऊर्जा समाहित होती है और इस स्वरूप को तो स्वयं त्रिमूर्ति यानी की ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी पूजते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि यदि यह माता अपने पात्र से प्रसन्न हो जाती हैं तो शत्रु उनके इर्द-गिर्द नहीं टिकते हैं। साथ ही उसको त्रिमूर्तियों की ऊर्जा भी प्राप्त होती है। जातक की कुंडली का छठा भाव और ग्यारहवां भाव इनकी पूजा से सशक्त होता है। लेकिन साथ-साथ तृतीय भाव में भी जबरदस्त ऊर्जा आती है। शत्रु पक्ष परेशान कर रहें हो, कोर्ट-केस हो तो माता के इस स्वरूप किए पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है।

शुक्रवार को दशमी तिथि 3 अप्रैल को नवरात्रि के पहले दिन स्थापित किए गए जवारे विधि-विधान पूर्वक विसर्जन किए जाते हैं। विसर्जन के पूर्व माता भगवती तथा जवारों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। ये पूजन विधि इस प्रकार है। शुभ मुहूर्त सुबह 07:50 से 10:40 तक, दोपहर 12:30 से 01:50 तक, शाम 05:00 से 6:30 तक करें। इसका पूजन  विधि जवारे विसर्जन के पहले भगवती दुर्गा का गंध, चावल, फूल, आदि से पूजा करें तथा इस मंत्र से देवी की आराधना करे रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे।पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे।।महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी।आयुरारोग्यमैश्वर्यं देहि देवि नमोस्तु ते।।

इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद हाथ में चावल व फूल लेकर जवारे का इस मंत्र के साथ विसर्जन करना चाहिए

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि।

पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च।। इस प्रकार विधिवत पूजा करने के बाद जवारे का विसर्जन कर देना चाहिए, लेकिन जवारों को फेंकना नही चाहिए। उसको परिवार में बांटकर सेवन करना चाहिए। इससे नौ दिनों तक जवारों में व्याप्त शक्ति हमारे भीतर प्रवेश करती है। जिस पात्र में जवारे बोए गए हों, उसे तथा इन नौ दिनों में उपयोग की गई पूजन सामग्री का श्रृद्धापूर्वक विसर्जन कर दें। इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद हाथ में चावल व फूल लेकर जवारे का इस मंत्र के साथ विसर्जन करना चाहिए-गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि। पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च।। इस प्रकार विधिवत पूजा करने के बाद जवारे का विसर्जन कर देना चाहिए, लेकिन जवारों को फेंकना नही चाहिए। उसको परिवार में बांटकर सेवन करना चाहिए। इससे नौ दिनों तक जवारों में व्याप्त शक्ति हमारे भीतर प्रवेश करती है। जिस पात्र में जवारे बोए गए हों, उसे तथा इन नौ दिनों में उपयोग की गई पूजन सामग्री का श्रृद्धापूर्वक विसर्जन कर दें। 

Posted By: Preeti jha

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस