रीता दास, सिलीगुड़ी :

शिक्षण का पेशा जिम्मेदारी का पेशा है। यदि हम नैतिकता से समझौता करेंगे, तो हमारा मान गिरेगा। हमें कदम-कदम पर लज्जित होना पड़ेगा। यह किसी भी तरह से छात्र के हित में नहीं है। उक्त विचार है सिलीगुड़ी मॉडल हाईस्कूल के प्राचार्य व निदेशक डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल का। संस्कार शाला की पहली कड़ी 'शिक्षक का महत्व'पर अपना विचार रखते हुए उन्होंने अपना विचार दैनिक जागरण से साझा किया। वे मानते व स्वीकार करते है कि आज के दौर में विभिन्न कारणों से शिक्षक का मान घटा। इसके पीछे हमारी शिक्षा नीति, हमारा समय, मानसिकता आदि विविध कारण जिम्मेदार है। वें आगे कहते है-'मैं अपनी बात कहूं, तो आज भी अपने गुरू का चरण स्पर्श करता हूं। हमें कड़े अनुशासन में रखा गया। लेकिन मेरे अभिभावक ने इसके लिए कभी प्रतिवाद नहीं किया। स्कूल में जाकर शिक्षकों का अपमान नहीं किया। ' लेकिन आज देखिए सरकार की चाइल्ड फ्रेंडली और कानून का हवाला देकर एक डांट पड़ने पर अभिभावक हंगामा करने लगते है। वैसे अर्थ युग भी है। छात्र व उनके अभिभावक को लगता है कि हम एजुकेशन खरीद रहे है और शिक्षक को लगता है कि हम बेच रहे है। जब यह आदर्श व संदेवदनशील पेशा जब बाजार में तबदील होगी, तो दिक्कते होंगी ही। मूल्य गिरेगा। कुछ शिक्षक पैसा पाकर छात्रों की नजर में अच्छा बनने के लिए पढ़ाते है। वें क्षणिक लाभ के चक्कर में छात्र भविष्य के साथ खिलवाड़ करते है। मेरा मानना है कि इस पेशे की गरीमा को बचाने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर अधिक है। वहीं अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि अपने घर से छात्रों को अपने गुरू कासम्मान देने का संस्कार सिखाए। तभी वें सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकते है। गुरू का आशीर्वाद पा सकते है। शिक्षक-छात्र के संबंध की नि:स्वार्थ भाव से निभाने की जरूरत है। तभी शायद शिक्षक दिवस के उद्देश्य की पूर्ति भी होगी। वरना 'शिक्षक दिवस' बस एक उत्सव या रस्म भर रह जाएगा। शिक्षक का महत्व या महत्ता गिरेगा।

Posted By: Jagran