कोलकाता, विशाल श्रेष्ठ। वह एक कंपनी की सीईओ हैं। कंपनी को आगे ले जाने के लिए उन्हें ऑफिस में बैठकर बड़े-बड़े निर्णय लेने होते हैं। वह एक मां भी हैं। उन्हें घर में दो-दो बच्चे संभालने पड़ते हैं, लेकिन सबसे पहले वह एक महिला हैं। कहते हैं एक महिला की पीड़ा दूसरी महिला से अच्छा कोई नहीं समझ सकता। पैडमैन अरुणाचलम मुरुगनंतम को आज सब जानते हैं।

महिलाओं को माहवारी (पीरियड्स) को लेकर होने वाली समस्याओं के निवारण के लिए उन्होंने जो काम किए हैं, उसपर फिल्म भी बन चुकी है। आइए अब मिलते हैं 42 साल की ऋचा सिंह से, जिन्होंने ‘नाइन मूवमेंट’ के जरिए महिलाओं को माहवारी के प्रति जागरूक करने और उस दौरान होने वाली समस्याओं को दूर करने का बीड़ा उठाया है।

इस अभियान के तहत अब तक छह लाख से अधिक सैनेटरी पैड नि:शुल्क बांटे जा चुके हैं। दूरदराज के गांव, स्कूल जाकर महिलाओं व लड़कियों को माहवारी व उस दौरान बरती जाने वाली स्वच्छता के प्रति जागरुक किया जा रहा है। ऋचा शीर्ष से जमीनी स्तर तक इस अभियान की अगुआई कर रही हैं। नाइन मूवमेंट के संस्थापक अमर तुलस्यान हैं।

देश में सिर्फ 18 फीसद महिलाएं कर रहीं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल :

ऋचा ने बताया-‘देशभर में सिर्फ 18 फीसद महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं। बाकी 82 फीसद जागरुकता की कमी व आर्थिक तंगी के कारण गंदे कपड़े और यहां तक कि राख का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। इससे सर्वाइकल कैंसर का खतरा दिन-ब-दिन बढ़ रहा है।

नाइन मूवमेंट का लक्ष्य इस बड़े अंतर को पाटना है। हम विभिन्न राज्य सरकारों के साथ काम कर रहे हैं। पंजाब के 100 स्कूलों में 50,000 लड़कियों को जागरूक किया जा रहा है। राजस्थान में भी इसी तरह काम शुरू हुआ है। पश्चिम बंगाल में आइआइटी खड़गपुर के साथ अभियान चलाया जाएगा। नि:शुल्क बांटने के साथ ही आर्थिक व्यवहार्यता बनाए रखने के लिए हम बेहद कम मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण सैनिटरी पैड तैयार कर विभिन्न एनजीओ को भी मुहैया करा रहे हैं। इस बाबत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में प्लांट लगाया गया है, जहां सालाना 36 करोड़ सैनिटरी पैड्स का उत्पादन होता है। प्लांट में 200 लोग काम करते हैं, जिनमें 60 महिलाएं भी शामिल हैं।’

उत्तर प्रदेश सबसे पिछड़ा ऋचा ने बताया-‘माहवारी के प्रति जागरुकता के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे पिछड़ा राज्य है। वहां महज 9-12 फीसद महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं। उसके बाद राजस्थान है जबकि बिहार तीसरे स्थान पर है।

माहवारी शुरू होने पर मां हो गई थी उदास :

ऋचा ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा-‘जब मुङो माहवारी शुरू हुई थी तो मां बहुत उदास हो गई थी। मैं अपने पिता से कभी इस बारे में बात नहीं कर पाई। बेहद शिक्षित परिवार से होने के बावजूद अपने घर में खुलापन नहीं मिल पाया। इस हालात ने कुछ करने के लिए प्रेरित किया।’ ऋचा ने आगे कहा-‘माहवारी शुरू होना स्वस्थ संकेत है। इसे लेकर शरमाने या ि‍ि‍झझकने की जरुरत नहीं है। यह महिला की प्रजनन क्षमता का सूचक है इसलिए इसे मां बनने की दिशा में पहला कदम माना जा सकता है। मां नौ महीने तक शिशु को गर्भ में धारण करती हैं इसलिए इस आंदोलन को नाइन मूवमेंट नाम दिया गया।’

कम नहीं आईं मुश्किलें :

ऋचा ने कहा-‘जमीनी स्तर पर उतरने से वास्तविक स्थिति मालूम होती है। इस अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के रामपुर में जब मैंने महिलाओं को नि:शुल्क सैनेटरी पैड देने की कोशिश की तो जागरुकता की कमी के कारण उन्होंने खुद ही लेने से साफ इनकार कर दिया। स्थानीय दुकानदारों ने भी जबर्दस्त विरोध किया। उन लोगों को काफी समझाना पड़ा।’

ऋचा सिंह का परिचय :

ऋचा का जन्म उत्तर प्रदेश के कालपी में हुआ। उनकी स्कूलिंग लखनऊ के सेंट एग्नेस लोरेटो से हुई। बाद में उन्होंने आइआइएम बेंगलूर से एमबीए किया। उनके पिता विनोद कुमार सिंह एयरोनॉटिकल इंजीनियर रहे हैं जबकि मां इंदु सिंह सेवानिवृत्त शिक्षिका हैं। ऋचा नाइन में स्ट्रूअल हाइजिन प्रोडक्ट्स की सीईओ हैं।

Posted By: Preeti jha

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