सिलीगुड़ी [जागरण स्पेशल]। ढाक के तीन पात। इस कहावत को हम बार-बार अपनी बोलचाल या लिखने के दौरान प्रयोग करते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों के पता है कि यही ढाक हमारे स्वास्थ्य के लिए कितना उपयोगी है। कितने रोगों की दवा है। इसे पलाश भी कहते हैं। इस समय पलाश फूलने लगे हैं। इसके फूल को मानिए तो सोने से भी कीमती हैं। इसकी फलियों के प्रयोग से बुढ़ापा दूर भागता है। इसके गुणों के ही कारण इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास वेदों और पुराणों में बताया गया है। इस अद्बुत पेड़ के सभी अंग हमारे लिए दवा हैं। इसके फूलों से रंग बनाकर यदि होली खेलें तो कई रोगों से अपने आप निजात मिल जाती है।
होली का एक गीत भी प्रसिद्ध है- बजारे से रंग जिन लियाया पिया, हम टेसू से खेलब होरी...। टेसू के फूलों से बने रंग से होली खेलने से शरीर मेें रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि होती है। यह मौसम का संधिकाल होता है। इसके कारण चेचक सहित तमाम व्याधियां हमला करती हैं। इन सभी मौसमी बीमारियों से टेसू का रंग हमारी रक्षा करता है। लिहाजा केमिकलयुक्त रंगों से होली खेलने के बजाए इसे प्रमुखता दें। इस समय हर जगह टेसू के फूल हैं। उन्हें समेट कर आसानी से रंग बनाया जा सकता है। 
आइए जानते हैं इसके औषधीय गुणों के बारे में...
खूनी बवासीर : टेसू के पंचाग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) की राख लगभग 15 ग्राम तक गुनगुने घी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर में आराम होता है। इसे कुछ दिन लगातार खाने से बवासीर के मस्से सूख जाते हैं। 
जोड़ों का दर्द : टेसू के बीजों को बारीक पीसकर शहद के साथ दर्द वाले स्थान पर लेप करने से संधिवात में लाभ मिलता है।
अंडकोष की सूजन : टेसू के फूल की पोटली बनाकर नाभि के नीचे बांधने से मूत्राशय (वह स्थान जहां पेशाब एकत्रित होता हैं) के रोग समाप्त हो जाते हैं और अंडकोष की सूजन भी नष्ट हो जाती है। टेसू की छाल को पीसकर लगभग चार ग्राम पानी के साथ सुबह और शाम देने से अंडकोष का बढ़ना खत्म हो जाता है। 
पलाश के पत्तलः पलाश के पत्तों से बने पत्तल पर नित्य कुछ दिनों तक भोजन करने से शारीरिक व्याधियों का शमन होता है। यही कारण है के प्राचीनकाल से पलाश के पत्तों से निर्मित पत्तलों पर भोजन किया जाता है।
छाल : नाक, मल-मूत्र मार्ग या योनि से रक्तस्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (50 मिली) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिलाकर पिलाएं।
रक्त एवं पित्त विकार मेंः पलाश की ताजा निकाली हुई छाल के काढ़े का सेवन कुछ दिनों तक करें। काढ़ा पानी में बनाएं। इसके लिए दो सौ मिली पानी में दस ग्राम छाल को पर्याप्त उबालकर काढ़ा तैयार करें।
गोंद : पलाश का एक से तीन ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध या आंवला रस के साथ लेने से बल-वीर्य की वृद्धि होती है तथा हड्डियां मजबूत बनती हैं। यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।

आंखों के रोग : पलाश की ताजी जड़ का एक बूंद रस आंखों में डालने से आंख की झांक, खील, फूली, मोतियाबिंद तथा रतौंधी आदि प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
श्वेत कुष्ठ उपचार मेंः प्रारंभिक अवस्था का श्वेत कुष्ठ पलाश की जड़ के चूर्ण के सेवन से ठीक हो जाता है। उसके लिए पलाश की जड़ को ठीक से सुखाकर उसके चूर्ण कि पांच ग्राम मात्रा पानी के साथ लेनी चाहिए। जड़ को घिसकर उस स्थान पर लगाया भी जा सकता है।
मिर्गी : चार से पांच बूंद टेसू की जड़ों का रस नाक में डालने से मिर्गी का दौरा बंद हो जाता है।
घेंघा रोग : पलाश की जड़ को घिसकर कान के नीचे लेप करने से घेंघा मिटता है। 
नकसीर (नाक से खून आना) : पलाश के पांच से सात फूलों को रात भर ठंडे पानी में भिगोएं। सुबह के समय में इस पानी से निकाल दें और पानी को छानकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर पी लें। इससे नकसीर में लाभ मिलता है। 
प्रमेह : पलाश की मुंहमुदी (बिल्कुल नई) कोपलों को छाया में सुखाकर कूट-छानकर गुड़ में मिलाकर लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से प्रमेह नष्ट हो जाता है। टेसू की जड़ का रस निकालकर उस रस में तीन दिन तक गेहूं के दाने को भिगो दें। उसके बाद दोनों को पीसकर हलवा बनाकर खाने से प्रमेह, शीघ्रपतन और कामशक्ति की कमजोरी दूर होती है। 
हाथी पांव मेंः पलाश की जड़ का चूर्ण Arand के तेल में मिलाकर लगाने से लाभ होता है। |
पेट में गैस बनना : पलाश की छाल और शुंठी का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा सुबह और शाम पीने से अफारा और पेट का दर्द नष्ट हो जाता है। 
पेट के कीड़े : पलाश के बीज, कबीला, अजवायन, वायविडंग, निसात तथा किरमानी को थोड़े सी मात्रा में मिलाकर बारीक पीसकर रख लें। इसे लगभग तीन ग्राम की मात्रा में गुड़ के साथ देने से पेट में सभी तरह के कीड़े खत्म हो जाते हैं। टेसू के बीजों के चूर्ण को एक चम्मच दिन में दो बार सेवन करने से पेट के सभी कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं।
दस्त : टेसू के गोंद लगभग 650 मिलीग्राम से लेकर दो ग्राम तक लेकर उसमें थोड़ी दालचीनी और अफीम (चावल के एक दाने के बराबर) मिलाकर खाने से दस्त आना बंद हो जाता है। 
सूजन : टेसू के फूल की पोटली बनाकर बांधने से सूजन नष्ट हो जाती है। 
हैजा : टेसू के फल 10 ग्राम तथा कलमी शोरा 10 ग्राम दोनों को पानी में घिसकर या पीसकर लेप बना लें। फिर इसे रोगी के पेडू पर लगाएं। यह लेप रोगी के पेड़ू पर बार-बार लगाने से हैजा रोग ठीक हो जाता है। 
गर्भनिरोध : टेसू के बीजों को जलाकर राख बना लें और इस राख से आधी मात्रा हींग को इसमें मिलाकर रख लें। इसमें से तीन ग्राम तक की मात्रा ऋतुस्राव (माहवारी) प्रारंभ होते ही और उसके कुछ दिन बाद तक सेवन करने से स्त्री की गर्भधारण करने की शक्ति खत्म हो जाती है। 
बांझपन मेंः पलाश की फली को सुखाकर जलाकर इसकी राख बना लें। इस राख को देसी गाय के दूध के साथ सेवन करने से बांझपन दूर होता है। पलाश का पत्ता भी गर्भधारण करने में बहुत सहयोगी हैं। गर्भधारण के पहले महीने एक पत्ता, दूसरे महीने दो पत्ते, इसी प्रकार नौवे महीने नौ पत्ते ले कर एक गिलास दूध में पकाकर सुबह शाम लेना चाहिए। 

 

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