-जब भी पहाड़ आते थे तो कहते थे हम है वाजपेयी जी के हनुमान, समस्या का करेंगे समाधान

-पहाड़ की दुर्दशा पर हमेशा रहते थे चिंतित, हिंसा नहीं बातचीत कर चाहते थे समस्या का समाधान

जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी :

जब भी दार्जिलिंग हिल्स की मांग अलग राज्य गोरखालैंड की मांग की बात होगी तो उस समय पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा के सांसद जसवंत सिंह का चेहरा लोगों के सामने होगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि गोरखालैंड के मुद्दे को वे अपने संसदीय क्षेत्र से उठाकर सदन तक ले गये थे।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह का लंबी बीमारी के बाद रविवार को निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे। उनके निधन पर उनके जानने वालों और भाजपा कार्यकर्ताओं में काफी शोक है। भाजपा के नेता व स्थानीय सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता राजू बिष्ट ने श्रद्धाजलि अíपत करते हुए कहा कि उन्होंने निष्ठापूर्वक भारत की सेवा की और उन्हें राजनीति तथा समाज से संबंधित मामलों में उनके अद्वितीय दृष्टिकोण के लिए याद किया जाएगा। दार्जिलिंग हिल्स में जसवंत सिंह की छवि उदार नेता के तौर पर प्रख्यात थी। उनकी उदारावीद सोच का एक उदाहरण यह है कि एक बार पार्टी लाइन के अलग कथन के लिए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। जसवंत सिंह के साथ कई बार पहाड़ पर जाने का मौका मिला। वे कभी भी किसी बात को लेकर नहीं सोचते थे। जब भी उनसे 2009 में अपनी किताब जिन्ना इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस में नेहरु और पटेल की निंदा की बात और मोहम्मद जिन्ना के लिए तारीफ के बोल बोले जाने पर पूछने पर कहते। इन बातों में क्या रखा है जो हो गया सो हो गया। हमें देश और संसदीय क्षेत्र की समस्या को लेकर सोचना है। हमेशा उनके साथ साए की तरह भवानी सिंह साथ होते थे। जसवंत सिंह उन गिने-चुने राजनेताओं में से थे जिन्हें भारत के विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था.

विदेश मंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी, 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया के सामने भारतीय पक्ष को रखकर उनकी ग़लतफ़हमिया? दूर करना। जसवंत सिंह ने इस भूमिका को ठीक तरह से निभाया। जसवंत और अमरीकी उप-विदेश मंत्री स्ट्रोब टालबॉट के बीच दो सालों के बीच सात देशों और तीन महाद्वीपों में 14 बार मुलाक़ात हुई. एक बार तो दोनों क्रिसमस की सुबह मिले ताकि उनकी बातचीत का मोमेंटम बना रहे। टालबॉट ने अपनी किताब इंगेजिंग इंडिया डिप्लॉमेसी, डेमोक्रेसी एंड द बॉम्ब में लिखा, जसवंत दुनिया के उन प्रभावशाली इंसानों में से है। इस संबंध में पूछने पर वे हंसते हुए कहते है कोई भी कुछ लिख सकता है।

समय के अनुसार करते थे काम

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह समय के अनुसार काम करने वालों में से थे। सैनिक का अनुशासन उनके कार्य में झलकता था। एक बाद बागडोगरा एयरपोर्ट पर भाजपा के कुछ नेता उनसे मिलने वाले थे। जो समय उन्हें दिया गया था उससे वे लेट हो गये। जब नेताओं के प्रतिनिधि वहां पहुंचे तो उन्होंने कहा यह ठीक नहीं है। जब आप एक सांसद को समय देकर उस समय नहीं मिल पाते तो जनता के बीच आपसब कैसे जाते होंगे? इसे पहली और अंतिम गलती समझकर काम करें। वह जब भी पहाड़ की समस्या को लेकर पत्रकारों के जबाव देते थे तभी कहते अरे हम बाजपेयी के हनुमान है। सब ठीक हो जाएगा। समय का इंतजार करें। वे 1962 के युद्ध के समय जिस पहाड़ यानि दार्जिलिंग कालिम्पोंग को देखा था उसे वर्तमान में देख दु:ख व्यक्त करते थे। कई बार कहते थे पर्यावरण को आज का युवा क्यों नहीं समझ पा रहा है आने वाले दिनों में काफी कष्ट होगा।

जिद के पक्के थे जसवंत

जसवंत सिंह जिद के पक्के थे। जब मदन तमांग हत्या कांड के बाद कई समाचार पत्र को पहाड़ पर रोक लगाने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सुप्रीमो विमल गुरुंग ने तय किया तो वे जागरण के लिए अड़ गये। दार्जिलिंग के एक होटल में विमल गुरुंग को बुलाकर कहा था कि नेशनल पेपर के साथ इस प्रकार की कोई बात नहीं होनी चाहिए। वही हुआ भी सांसद के इस मंत्र को मानकर स्वयं विमल गुरुंग ने सभी पहाड़वासियों को हिन्दी दैनिक जागरण पढ़ने का आह्वान किया था। यह जिद 2014 में भी देखने को मिला। जसवंत सिंह बगावत पर उतर आए और निर्दलीय चुनाव लड़े। जसवंत सिंह उस वक्त दाíजलिंग से बीजेपी के सासद थे। उनकी बगावत को देखते हुए बीजेपी के कई आला नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन वे अपने फैसले से नहीं डिगे। जसवंत सिंह की शिकायत थी कि उनका टिकट काटने का फैसला एक तरह से अपमानित करने वाला निर्णय है। जसवंत सिंह ने अपनी पार्टी के नेताओं के मान-मनौव्वल को नहीं माना और चुनाव मैदान में उतर गए. इस चुनाव में उन्हें हार मिली। चुनाव हारने के बाद जसवंत सिंह दिल्ली आ गए और एक तरह से एकातवास में चले गए. कुछ दिन बाद खबर आई कि जसवंत सिंह रात को बाथरूम में गिर गए और उन्हें इतनी गंभीर चोट लगी कि वे कोमा में चले गए. तबीयत खराब होने की खबर सुन वसुंधरा राजे जसवंत सिंह से मिलने दिल्ली आईं लेकिन उस वक्त वे कोमा में थे। वसुंधरा राजे दिल्ली से राजस्थान लौट गईं और दोनों के बीच के संबंध उसी दौर में अटके रह गए जब जसवंत सिंह का टिकट काटा गया था।

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