महाशिवरात्रि विशेष

-21 को महाशिवरात्रि की तैयारी में भक्त, मंदिरों के साथ मेले में जुटने वाली भीड़ को ले पुलिस गंभीर

जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी :

साल 2020 में महाशिवरात्रि पर्व 21 फरवरी को मनाया जायेगा। ये शिव और पार्वती के मिलन की रात मानी जाती है। लेकिन शिवरात्रि हर माह में आती है जिसे मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। फाल्गुन मास में आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि मनाई जाती है जिसका साल में आने वाली सभी शिवरात्रियों में सबसे अधिक महत्व माना गया है। इस मौके पर उत्तर बंगाल के विभिन्न शिव मंदिरों में पूजा अर्चना के साथ मेला लगाया जाता है। इसको लेकर जहां आयोजक अभी से तैयारी में जुटे है वही पुलिस प्रशासन व खुफिया विभाग द्वारा भी मेला में जुटने वाली भीड़ को लेकर गंभीरता से तैयारी शुरू कर दी गयी है।

जानिए दोनों शिवरात्रि में क्या है फर्क

आचार्य पंडित यशोधर झा ने बताया कि ये हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। जिसे प्रदोष भी कहा जाता है। हर महीने में आने के कारण इसे मासिक शिवरात्रि के नाम से भी लोग जानते हैं। जब यह तिथि श्रावण मास में आती है तो उसे बड़ी शिवरात्रि कहा जाता है। श्रावण मास भगवान शिव का माना जाता है इसलिए इस महीने आने वाली शिवरात्रि पर भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। इस दिन को शिव भक्त बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन व्रत रखने से कई व्रतों के बराबर पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है। मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में ही भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे।

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥

उन्होंने कहा कि ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंद्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। सूर्य देव इस समय पूर्णत :उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया है। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग ये जानते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। जिसका जिक्त्र कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। लेकिन शिव पुराण की एक कथा के अनुसार सृष्टि की शुरुआत में भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी में एक विवाद छिड़ गया था कि उन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है। दोनों के विवाद को देखकर उनके बीच में एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। जिसके मूल स्त्रोत का पता लगाने के लिए भगवान विष्णु वराह का रूप धारण करके पाताल की ओर बढ़े तो ब्रह्मा जी हंस का रूप लेकर आकाश की तरफ गये। लेकिन दोनों को उस स्तंभ का ओर-छोर नहीं मिल सका। फिर उस स्तंभ से भगवान शिव ने दर्शन दिया।

Posted By: Jagran

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