सिलीगुड़ी, अशोक झा। उत्तर बंगाल का सीमावर्ती क्षेत्र कभी खुशनुमा मौसम के मिजाज के लिए जाना जाता था। यहां का पर्यावरण इतना सुंदर व अनुकूल था कि जिसे ना देखने बल्कि यहां आराम फरमाने देश विदेश के लोग आते थे। अब यह ठीक उल्टा होने लगा है। पिछले दो सालों में लगातार बदलाव आ रहा है और इसका प्रतिकूल असर फुलबाड़ी और गाजलडोबा में देखने को मिल रहा है।

साल दर साल मौसम के उतार चढ़ाव से यहां के खुबसूरती का क्षरण हो रहा है। नदियां नाली का रुप ले लिया है। गर्मी, बरसात और ठंड में क्षेत्र में दिखने वाले क्षेत्रीय और प्रवासी पक्षियां विलुप्त होती जा रही है। क्षेत्र के जलाशय, जंगल और खेत खलियान में दिखने वाले पक्षियों की तादाद दिन प्रतिदिन घटती जा रही है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले गौरेया, बगुला, हमिंग बर्ड, बाज, बुलबुल बटेर, कठफोरवा, डब प्रजाति की पक्षियों की संख्या लगातार कमी आती जा रही है।

वहीं गर्मी और सर्दी के मौसम में दार्जीलिंग से सटे पूरे सीमावर्ती क्षेत्र के अनुकूल मौसम के कारण यहां प्रवासी पक्षी जो नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र, साइबेरिया, बांग्लादेश, असम आदि राज्यों से आते थे उसकी संख्या में भी धीरे-धीरे गिरावट आती जा रही है। ठंड और गर्मी के मौसम में प्रवासी पक्षी के रूप में सारस, कोयल, अढ़ंगा, गरूर, चिल, गिद्ध, पानकुमारी प्रजाति की पक्षियों का आना-जाना होता था।

बदलते मौसम के मिजाज से इन पक्षियों का प्रवास दुश्वार हो गया है। इस संबंध में बताते हैं कि सीमावर्ती क्षेत्र में जलाशयों की कमी, वृक्षों की कटाई और बदल रहे मौसम का असर पशु-पक्षियों पर दिख रहा है। क्षेत्रीय पक्षी भी अब खराब मौसम और आश्रय स्थल के अभाव में दूसरे जगह प्रवास कर रहे हैं।

प्रवासी पक्षी भी समान मौसम और शहरीकरण के कारण कारण अब प्रवास करने के लिए अनुकुल नहीं रहा है। दुख की बात यह है कि विलुप्त हो रहे पक्षियों को संरक्षित करने को क्षेत्र के मौसम के लिए प्रशासनिक और सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। पर्यावरण व जीव जन्तु के लिए काम करने वाले नैफ के संयोजक अनिमेष बसु का कहना है कि इसको लेकर पर्यावरण प्रेमियों के साथ मिलकर प्रशासन और सरकार को काम करना होगा। 

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Posted By: Preeti jha

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