सिलीगुड़ी, जागरण संवाददाता। सेवक रोड स्थित गुरुद्वारे में रविवार को लोहड़ी धूमधाम से मनाई गई। इस मौके पर गुरुद्वारा परिसर में अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसके चारों ओर परिक्रमा लगाई गई। तिल, रेवड़ी, मेवा सहित अन्य सामग्री अग्नि को समर्पित किया गया। इस मौके पर काफी तादाद में महिला, पुरुष और बच्चों के साथ पंजाबी समुदाय सहित अन्य समुदाय के लोग शामिल रहे। इसके साथ ही इसी क्रम में घरों में भी लोहड़ी पर्व मनाया गया। जहां पर परिवार के सदस्यों ने एक-साथ मिलकर पर्व की खुशियों को आपस में बांटा।

बताया गया कि लोहड़ी पर्व को सर्दियों की विदाई और बसंत के आगमन के संकेत के रूप में भी देखा जाता है। लोहड़ी के अवसर पर लोग रात में खुले स्थान पर अलाव जलाकर उसकी परिक्रमा करते हैं और गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्का इत्यादि अग्नि को अर्पित किया गया। बहुत से लोगों का मानना है कि यह अग्नि पौष की आखिरी रात और माघ की पहली सुबह की कड़क ठंड को कम करने के लिए जलाई जाती है। किसानों के लिए यह पर्व बहुत मायने रखता है।

दरअसल यह पर्व रबी फसलों की बुआई और कटाई से जुड़ा है। इस विशेष अवसर पर किसान अपनी फसलों की पूजा करते हैं और लोहड़ी पर्व को वे अपने लिए नववर्ष की शुरूआत मानते हैं। इस दिन वे मक्का, तिल, गेहूं, सरसों, चना इत्यादि अपनी रबी फसलों को अग्नि को समर्पित करते हुए ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं। इस त्यौहार में गन्‍ने की कटाई के बाद उससे बने गुड़ का भी इस्तेमाल किया जाता है।

कई और मान्यताओं से जुड़ा है पर्व :

लोहड़ी पर्व मनाए जाने के संबंध में कई किस्से और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस त्यौहार को मुख्य रूप से पंजाब में गरीबों के मददगार माने जाते रहे दुल्ला भट्टी से जोड़कर देखा जाता रहा है। मुगलकाल में बादशाह अकबर के शासनकाल में पंजाब में दुल्ला भट्टी नामक डाकू थे,जो गरीबों के मददगार माने जाते थे। वे अमीरों और जमींदारों से धन लूटकर गरीबों में बांट दिया करते थे। वह ऐसा दौर था, जब पंजाब में अमीर सौदागरों को गुलामी के लिए गरीब हिन्दू लड़कियां बेची जाती थी। कुछ अमीर व्यापारी सामान की जगह उस समय शहर की लड़कियों को बेचा करते थे। उसी के बाद दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया। माना जाता है कि तभी से प्रतिवर्ष लोहड़ी पर्व पर दुल्ला भट्टी की याद में उनकी कहानी सुनाए जाने की परम्परा चली आ रही है। लोहड़ी के गीतों के साथ जबतक दुल्ला-भट्टी की याद में यह गीत नहीं गाया जाता, तब तक लोहड़ी का उत्साह अधूरा ही लगता है।

अलाव और अग्नि परिक्रमा का महत्व : लोहड़ी के कई दिनों पहले से कई प्रकार की लकडिय़ां इकट्ठी की जाती हैं, जिन्हें नगर के बीच एक स्थान पर रखा जाता है और लोहड़ी की रात को सभी अपनों के साथ मिलकर इन लकडिय़ों को जलाकर इसके आसपास बैठते हैं। कई गीत गाते हैं, खेल खेलते हैं, आपसी गिले-शिकवे भूल एक-दूसरे को गले लगाते हैं और लोहड़ी की बधाई देते हैं।

विवाह की लोहड़ी :

आजकल लड़कों के पहले विवाह की लोहड़ी भी मनाए जाने की रस्म है। इस मौके वही रस्में निभाई जाती हैं जो लड़के के जन्म के समय निभाई जाती हैं। घर-घर लोहड़ी बांटी जाती है और अलग-अलग पकवान बनते हैं।नवविवाहित जोड़ी को इकट्ठे रहने का आशीर्वाद दिया जाता है। लड़के के जन्म पर लोहड़ी पंजाबी समाज में लड़के का जन्म होने पर बहुत खुशियां मनाई जाती हैं। रिश्तेदार, दोस्तों और मित्रों को घर बुलाकर बहुत बड़ा धूना लगाया जाता है। आग की पूजा की जाती है। इस मौके नवजन्में लड़के की लम्बी उम्र की कामना की जाती है। अच्छी बात यह है कि आजकल लड़की के जन्म पर भी लोहड़ी मनाई जाती है और रिश्तेदार मिलकर खुशी मनाते हैं।

मकर संक्रांति पर बाजारों में चहल पहल

पूवरेत्तर का प्रवेशद्वार है सिलीगुड़ी। इसे मिनी इंडिया के नाम से सीमांचल में जाना जाता है। मकर संक्रांति को लेकर यहां तैयारी जोरों पर है। यहां के बाजारों में संक्रांति के मौके पर नये चावल के तैयार आटा से बंगाली परिवार पीठा तैयार करते है। इसमें नारियल के साथ खजुर गुड़ का प्रयोग होता है। सबसे मजे की बात है कि यहां बाजार में नजर के सामने तैयार चावल के आटा को ग्राहक खरीदते हैं।

मकर संक्रांति को कई परिवारों द्वारा गुजरात की तर्ज पर पतंगबाजी की जाती है। बाजार में पतंग की बिक्री भी हो रही है। विधानमार्केट के मुढ़ी बाजार में दो दिनों से लोग संक्रांति के लिए खरीदारी में व्यस्त है। सुबह से ही बाजार में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे है जो देर रात तक जारी है। मंगलवार के दिन अश्विनी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाया जाएगा। यह योग वषरे बाद आया है। यह कहना है आचार्य पंडित यशोधर झा का।

उन्होंने बताया कि 14 जनवरी यानि मंगलवार की मध्यरात्रि में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हो जाएगा। इसके साथ ही बुधवार को दोपहर 12 बजे को पुण्यकाल में मकर संक्रांति का पर्व मना सकेंगे। सूर्यास्त से पहले सूर्य का संक्रमण हो तो उसी तिथि व दिन में मकर संक्रांति मनाना शास्त्र सम्मत है। कहा जाता है कि मकर से मिथुन राशि तक उत्तरायण में और कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायण में रहते है।

शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायण को देवताओं का रात्रि कहा जाता है। यह मान्यता है कि दिवंगत आत्माएं भी उत्तर दिशा में हो जाती है, जिससे उन्हें देवताओं का सानिध्य मिलता है। भीष्म ने भी अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। उन्होंने बताया कि मकर संक्रांति इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग सुख-समृद्धि के का शुभ संदेश लेकर आएगी। 

Posted By: Preeti jha

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