सौरभ खंडेलवाल, कोलकाता। Indian International Science Festival in Kolkata. राजस्थान की रेतीली जमीन और गर्म मौसम में कोई अनार औैर सेब उगा सकता है? सहसा विश्वास नहीं होता, लेकिन इसे सच कर दिखाया है राजस्थान के सीकर की सुपर वूमेन संतोष देवी ने। अपनी खेती के तरीके से संतोष देवी ने न सिर्फ परिवार की मुफलिसी दूर की बल्कि वे अपने गांव के आसपास भी एक उन्नत खेती की अलख जगा रही हैं। खास बात यह है कि वह यह सब ऑर्गनिक फॉर्मिंग की मदद से कर रही हैं।

कोलकाता में भारतीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव में महिला वैज्ञानिकों के सत्र में हिस्सा लेने आईं संतोष देवी ने बताया कि उनके परिवार के पास सिर्फ सवा एकड़ जमीन है। वे सिर्फ पांचवीं कक्षा तक पढ़ी हैं, लेकिन बचपन में घर में खेती के गुर सीखे थे। पति रामकरण सिंह की पुलिस में नौकरी थी और उनका मासिक बहुत कम था। इस कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था तो अनार की खेती करने का विकल्प किसी ने सुझाया। पैसे नहीं थे तो एक भैंस बेच दी। इससे अनार के पौधे खरीदे और ड्रिप के जरिये सिंचाई शुरू की। शुरू में एक-दो पौधे मुरझाए तो लगा पैसा बर्बाद न हो जाए, मगर धीरे-धीरे पौधे बड़े होते गए। करीब तीन साल के बाद पेड़ ने फल देना शुरू कर दिया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पहली फसल में अच्छा खासा मुनाफा हुआ। इसके बाद एक सेब का पेड़ लगाया तो वह भी फल देने लगा। फिर इस साल एक दर्जन सेब के पौधे लगाए हैं। इस काम में अब उनके पति भी उनका साथ देते हैं। उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी है।

संतोष देवी के मुताबिक, अनार की खेती से हर महीने लगभग 25 हजार रुपये की कमाई हो जाती है। सिर्फ खेती नहीं, क्षेत्र में ऑर्गनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए संतोष देवी ने अनार की नर्सरी भी खोल ली है। जो फसल होती है, उसी से बीज तैयार कर नर्सरी के लिए पौधे उगाती हैं। उनके साथ-साथ कई किसान अब राजस्थान में अनार की खेती कर रहे हैं। अपनी नर्सरी से वे अनार के पौधे उन किसानों को बेचती हैं और उससे भी अच्छी-खासी कमाई कर लेती हैं।

जैविक खाद के उपयोग का नया तरीका सिखाया

संतोष देवी की तरह का वैज्ञानिक कार्य महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देवगांव में रहने वाली आदिवासी महिला किसान ममता बाई भांग्रे ने किया है। वह गरीब परिवार से हैं। दो एकड़ खेत है। धान के लिए जैविक खाद (वर्मी कंपोस्ट) का उपयोग करती हैं और आठ साल में न सिर्फ फसल का उत्पादन दो गुना हो गया और बल्कि उन्होंने अपनी इस तकनीक की ढाई हजार किसानों को ट्रेनिंग भी दी है। वह भी महिला वैज्ञानिकों के सत्र में हिस्सा लेने आई थीं। वे बताती हैं कि एक दिन बारिश में खेत में डाला गया वर्मी कंपोस्ट पूरा बह गया। मैं बहुत उदास थी और मिट्टी पर पत्थर मार रही थी।

एक पत्थर जाकर मिट्टी में धंस गया। इससे मेरे मन में विचार आया कि यदि वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) की गोलियां बनाकर धान के साथ मिट्टी में ही रोपी जाएं तो काम आसान हो सकता है। मैंने इसकी रसगुल्ले बराबर की गोलियां तैयार कीं और अपने खेत में धान रोपने के दौरान मिट्टी के अंदर इसे भी डालती गईं। करीब चार-पांच साल तक खुद इसका प्रयोग किया। इसके बाद मिट्टी की गुणवत्ता में बदलाव आया और फसल उत्पादन बढ़ने लगा। आठ साल में हालत यह है कि पहले 10 बोरी धान होता था तो अब 20 बोरी हो रहा है।

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Posted By: Sachin Mishra

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