कोलकाता, विशाल श्रेष्ठ । महात्मा गांधी उनके मन ही नहीं, एक समय उनके घर के भी बेहद करीब रहे थे, शायद इसीलिए बापू से उनका अद्भुत लगाव है। 47 साल की पापड़ी सरकार पिछले दो दशक से कोलकाता में मौजूद गांधीजी की धरोहर को सहेजकर रख रही हैं। यह उनके अथक प्रयास का ही नतीजा है कि कोलकाता के बेलियाघाटा इलाके में स्थित गांधी भवन का न सिर्फ जीर्णोद्धार संभव हुआ,बल्कि उसे सरकार से विरासती स्थल का दर्जा भी मिल चुका है।

15 अगस्त,1947 की मध्यरात्रि को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, उस वक्त गांधीजी अपने अनुयायियों के साथ इसी जगह ठहरे हुए थे। यह वही ऐतिहासिक भवन भी है, जहां आजादी मिलने के बाद तत्कालीन कलकत्ता समेत देश के विभिन्न स्थानों पर फैले सांप्रदायिक दंगे को रोकने के लिए ‘साबरमती के संत’ ने आमरण अनशन किया था। पापड़ी गांधी भवन के संरक्षण से जुड़ी संस्था पूर्व कलिकाता गांधी स्मारक समिति की संयुक्त सचिव हैं। 

पिता की बातों से हुआ गांधीजी से जुड़ाव

पापड़ी ने बताया-‘मेरे पिता बिमल कुमार सरकार गांधीजी से काफी प्रभावित थे। वे बचपन में बापू से जुड़े बहुत से किस्से मुझे सुनाया करते थे। उनकी बातें सुनकर गांधीजी से जुड़ाव हुआ। हमारा घर गांधी भवन से चंद कदमों की दूरी पर है। बचपन में मुझे पता ही नहीं था कि कभी मेरे घर के पास ही गांधीजी आकर रहे थे। जब इस बात का पता चला, उस समय गांधी भवन की हालत बहुत खराब थी। देखरेख के अभाव में वह अपना अस्तित्व खोता जा रहा था। कारण, बहुत कम लोगों को इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के बारे में जानकारी थी। मुझे महसूस हुआ कि इसका संरक्षण करना मेरा दायित्व है और लोगों को इसके बारे में बताना जिम्मेदारी।

युवावस्था में मैं इसके संरक्षण का प्रयास कर रही इस संस्था से जुड़ गई। हमने सरकार का ध्यान गांधी भवन की ओर आकृष्ट कर इसे विरासती स्थल का दर्जा देने की मांग की। वर्षों के प्रयास के बाद आखिरकार हमारी कोशिश रंग लाई। राज्य सरकार ने पिछले साल इसे विरासती स्थल का दर्जा प्रदान करतेहुए इसका जीर्णोद्धार कार्य शुरू किया।

महात्मा गांधी पर कर रहीं शोध

रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से मास्टर्स डिग्री (निर्देशन) करने वाली पापड़ी वर्तमान में महात्मा गांधी पर शोध कर रही हैं। बापू के कोलकाता प्रवास से जुड़े विभिन्न पहलुओं व उस समय हुई घटनाओं पर स्थानीय लोगों व गांधीवादियों से बातचीत कर अध्ययन कर रही हैं। बकौल पापड़ी, महात्मा गांधी अपने अनुयायियों के साथ 13 अगस्त, 1947 को गांधी भवन आए थे। तब इस एक मंजिला भवन का नाम ‘हैदरी मंजिल’ था। वे यहां 25 दिनों तक रहे।

आजादी के बाद जब तत्कालीन कलकत्ता समेत देश के विभिन्न स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, उस वक्त यहीं पर गांधीजी ने इसके प्रतिवाद में एक सितंबर को आमरण अनशन शुरू किया था। उनके अनशन करने के बाद हिंदू-मुस्लिम समुदायों के नेताओं ने यहां आकर गांधीजी के चरणों में अपने हथियार डालकर उनसे माफी मांगी थी।

इतिहास में इस घटना को ‘द मिरेकल ऑफ कलकत्ता’ के नाम से जाना जाता है। 4 सितंबर को दंगे रुकने के बाद गांधीजी ने अपना अनशन खत्म किया था और 7 सितंबर को यहां से चले गए थे।’ पापड़ी ने आगे कहा कि बापू ने अपने जीवनकाल में बंगाल में कुल 566 दिन बिताए हैं। 

महात्मा गांधी की धरोहर को सहेज रहीं पापड़ी

तत्कालीन हैदरी मंजिल मूल रूप से ढाका के नवाब की बगान बाड़ी था। सूरत से बंगाल व्यापार करने आए दाउदी वोहरा समुदाय के लोगों ने इसे अधिग्रहित कर लिया था। 1923 में यह संपत्ति शेख आदम नामक शख्स ने खरीदी थी और बाद में इसे अपनी बेटी हुसैनाबादी बंगाली के सुपुर्द कर दिया था। एचएस सुहरावर्दी के अनुरोध पर गांधीजी यहां रहने आए थे। गांधीजी के यहां से जाने के बाद यह खंडहर में तब्दील होने लगी थी। उस वक्त जुगल घोष नामक शख्स ने इसके संरक्षण का बीड़ा उठाते हुए पूर्व कलिकाता गांधी स्मारक समिति की अनाधिकारिक तौर पर स्थापना की थी। 1985 में हैदरी मंजिल का नाम बदलकर गांधी भवन किया गया।

2009 में बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल व महात्मा गांधी के पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी ने गांधी भवन का दौरा कर समिति को यहां संग्रहालय शुरू करने का सुझाव दिया था। उनके सुझाव पर समिति ने यहां गांधीजी द्वारा इस्तेमाल किए गए चरखा, टोपी, कप, बिछौना समेत अन्य चीजों को लोगों के अवलोकन के लिए रखा। 2009 में गोपाल कृष्ण गांधी के यहां आने के बाद ही समिति का पंजीकरण हुआ और आज इसका जिम्मा पापड़ी व उनकी संस्था के अन्य पदाधिकारी संभाले हुए हैं।

Posted By: Preeti jha

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