कोलकाता, जेएनएन। कोलकाता की दुर्गापूजा कई मायनों में खास है लेकिन हुगली नदी के दूसरे किनारे पर बसा हावड़ा भी इस मामले में पीछे नहीं है, फिर चाहे थीम हो या पारंपरिक पूजा। कोलकाता के इस जुड़वे शहर की बात ही कुछ और है। केवल बड़े पूजा पंडाल ही नहीं, छोटे पंडालों का इतिहास भी काफी समृद्ध रहा है।

हावड़ा में ऐसी कई पूजा कमेटियां हैं, जिन्होंने गुलामी के वक्त दुर्गा आराधना शुरू की और आजादी के मुक्ताकाश तले अपना विस्तार किया। 

कहीं पर्यावरण का संदेश तो कहीं नृत्य शैली की झांकियां

सलकिया छात्र व्यायाम समिति ने इस साल भी एक खास संदेश देने को अपने पूजा मंडप का निर्माण किया था जिसमें आलापनी की ओर से पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखते हुए छोटे स्तर पर प्रशंसनीय मंडप बनाया गया था, जो दर्शनार्थियों को अपनी ओर खींच रहा था। बांधाघाट के बाजलपाड़ा ने अपने पूजा मंडप में 14 तरह की नृत्य झांकियों को पेश किया था। 

मौसम विभाग ने पूरी दुर्गापूजा तक बारिश का पूर्वानुमान जताया था। खासकर अष्टमी, नवमी व दशमी को अच्छी बारिश होने की। गौरतलब है कि पंचमी व षष्ठी की सुबह कोलकाता व आसपास के इलाकों में छिटपुट बारिश हुई, हालांकि इसका पूजा पर खास असर नहीं पड़ा क्योंकि दिन चढ़ने के साथ ही मौसम साफ हो गया था और कड़ी धूप निकल आई थी । अभी आलम यह है कि तेज धूप व उमस भरी गर्मी के बावजूद अभी लोग बारिश नहीं चाह रहे।

 दशमी के दिन महिलाओं ने जमकर सिंदूर खेला

गौरतलब है कि विजयादशमी के अवसर पर आज दशमी के दिन महिलाओं ने जमकर सिंदूर खेला। इस में बंगाली समाज की महिलाओं ने जमकर सिंदूर खेला। इस मौके पर काफी संख्या में शादी-शुदा महिलाओं ने हिस्सा लिया। वेस्ट बंगाल में इस कार्यक्रम का आयोजन बड़े धूमधाम से मनाया गया।

इस दौरान भी काफी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया।विजयादशमी  के इस पावन अवसर पर अंतिम दिन  इस कार्यक्रम में विवाहित महिलाएं हिस्सा लेती हैं। 

पश्चिम बंगाल में सिंदूर खेला की परंपरा की शुरूआत 450 साल पहले पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों से शुरू हुई थी। इस खास दिन विवाहित महिलाएं मां दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी की पूजा के बाद उनका उनका श्रंगार करती हैं और सिंदूर भी लगाती है।

इसके साथ ही महिलाएं एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं। इस त्योहार की मान्यता है कि इससे भगवान प्रसन्न होकर सभी महिलाओं को सुहागिन रहने का वरदान  देते हैं क्‍योंकि सिंदूर सुहाग की निशानी है इसलिए इसकी खास महत्‍ता है। 

नवरात्रि में मां की विदाई

 ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि  में मां  नौ दिनों के लिए अपने घर यानी मायके आती हैं। नवरात्रि के आखिरी दिन मां की विदाई के लिए ये परंपरा मनाई जाती है। 

Posted By: Preeti jha

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