-अपहरण के लिए कई दिनों से की जा रही थी रेकी

-पहले ड्रग्स देकर बहोश किया और युवक को साथ ले गए

-युवक आरोपितों के कैफे में भी जाया करता था

-पहले सभी साथ मिलकर छलकाते थे जाम से जाम एक्सकलूसिव

मोहन झा, सिलीगुड़ी : कहते हैं न बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। सरकारी कर्मचारी के 19 वर्षीय बेटे का अपहरण कांड इस कहावत पर बिल्कुल फिट बैठता है। कांड को बिल्कुल फिल्मी तर्ज पर ही अंजाम दिया गया था। बल्कि पुलिस ने भी उसी तर्ज पर तफ्तीश कर आरोपितों को गिरफ्तार किया। साथ ही अपहृत युवक को सही-सलामत बरामद किया। आरोपितों को शुक्रवार जलपाईगुड़ी अदालत में पेश किया गया। जहां से उन्हें पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है।

अपहृत युवक रितंकर सिंह का बयान दर्ज करने के साथ सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर उसे परिवार को सुपुर्द कर दिया गया है। अपहरण का यह मामला बच्चों की परवरिश, समाज की दिशा और राजनीतिक स्तर पर कई सवाल खड़े कर रहा है। सवालों के पहले अपहरण के साजिश की बात करें तो यह कांड आनन-फानन में नहीं किया गया। बल्कि कई दिनों की रेकी के बाद पहले पूरा प्लान तैयार किया गया, बल्कि रिहर्सल के बाद इसे अंजाम दिया गया। न्यू जलपाईगुड़ी थाना पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार रितंकर के पिता मानिक सिंह तीस्ता बैराज में ग्रुप-डी स्तर के कर्मचारी हैं। साइड से जमीन की खरीद-बिक्री और प्रमोटिंग का भी धंधा है। परिवार का एकलौता बेटा रितंकर राज कुमार की भांति ऐश-ओ-आराम की जिंदगी बसर करने वाला लड़का है। इसी उम्र में कॉफी शॉप व कैफे के साथ और भी कई शौक उसको लग गए थे। रितंकर के पिता भी तृणमूल कार्यकर्ता हैं। आरोपित रतन पाल उर्फ बाबू और तपन दास भी दार्जिलिंग जिला युवा तृणमूल के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 24 नंबर वार्ड में रतन पाल का एक कैफे है। पार्टी की वजह से रतन और तपन का इसके घर भी जाना-आना था। रितंकर इन्हें काकू (चाचा) कहा करता था।और शाम के समय रतन के कैफे में नाश्ता-पानी के लिए पहुंचता था। काकू के साथ दोस्ती इतनी गहरी हो चली थी कि साथ में बैठकर ग्लास भी टकराया करते थे। रितंकर के आव-भाव और जेब-खर्ची देखकर ही रतन ने तपन और राजा के साथ मिलकर पूरी साजिश रची। बीते जनवरी की शाम भी रितंकर काकू के कैफे में पहुंचा था। काकू ने फिर से साथ बैठकर ग्लास टकराने का प्रस्ताव दिया। राजी होकर रितंकर उसके साथ चल दिया। रतन अपने दो शार्गिदों के साथ रितंकर को लेकर शहर के संघाती मोड़ इलाके में पहुंचा। साजिश के तहत आरोपितों ने रितंकर के शराब में नशे की टेबलेट मिलाकर पिलाई। नशीला शराब पीते ही रितंकर बेहोश हो गया। इसके बाद रितंकर का मोबाइल बंद कर उसे देशबंधुपाड़ा स्थित रतन के किराये वाले फ्लैट में पहुंचाया गया। आरोपितों में शामिल राजा सिंह रितंकर की स्कूटी को न्यू जलपाईगुड़ी इलाके के एक शराब की दुकान के सामने रख आया। 14 जनवरी की सुबह आरोपितों ने हैदरपाड़ा इलाके में रितंकर का मोबाइल स्विच ऑन किया और फिर उसके पिता को 40 लाख की फिरौती के लिए कॉल किया। पुलिस की मानें तो फिरौती के लिए कई बार कॉल किया गया। लेकिन पुलिस को गुमराह करने के लिए फिरौती का कॉल करने के बाद मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया जाता था। पुलिस को कैसे मिली सफलता

मामले की तफ्तीश में जुटी पुलिस टीम रितंकर का मोबाइल ट्रैक कर हैदरपाड़ा का चक्कर काटने लगी। तीन दिनों तक हैदरपाड़ा का चक्कर काटने के बाद पुलिस रतन के कैफे पहुंची और संदेह के आधार पर कैफे की एक महिला कर्मचारी को हिरासत में लेकर पूछताछ की। इसके बाद पुलिस ने रतन पाल को हिरासत में लेकर सख्ती से पूछताछ किया। जहां उसने पूरी साजिश बयां की। इसके बाद पुलिस ने कांड में शामिल तपन और राजा को दबोचा। फिर इनकी निशानदेही पर पुलिस ने बीते गुरुवार की शाम देशबंधुपाड़ा के फ्लैट से रितंकर को अचेत स्थिति में बरामद किया। रुपया मिलते थी सलटा देने की बनी थी योजना

पुलिस की माने तो इस तरह अधिकांश मामलों में अपराधी अपने पीछे कोई भी सुराग छोड़ना नहीं चाहते। इसलिए फिरौती की रकम मिलने के बाद भी अपहृत की जिंदगी को समाप्त कर देते हैं। जबकि इस मामले में तो रितंकर सभी अपहरणकर्ताओं को पहचानता था। फिर इसकी जान कैसे बकसते। फिरौती की रकम मिलने के बाद या पुलिस का हाथ गर्दन तक पहुंचने के पहले ही रितंकर को दफन करने की योजना थी। कैफे के साथ रतन पाल का भी जमीन की खरीद-बिक्री और प्रमोटिंग का कारोबार है। लेकिन कारबार से जुड़ी रंजिश या आर्थिक लेन-देन का कोई मसला अब तक के पुलिस जांच में सामने नहीं आया है। पुलिस के मुताबिक रतन पाल के पास भी अच्छी खासी संपत्ति है। लेकिन उसने चार शादियां की है। बस पांच दिन की मेहनत से लाखो आ जाए तो किसे काटता है। तृणमूल का नाम जुड़ने से सनसनी

आरोपितों में शामिल रतन पाल उर्फ बाबू और तपन दास दार्जिलिंग जिला युवा तृणमूल के सक्रिय सदस्य बताये जा रहे हैं। बल्कि मामला सामने आने के पहले तक 24 नंबर वार्ड के तृणमूल उम्मीदवार प्रतूल चक्रवर्ती के साथ प्रचार अभियान में ये दोनों भी आगे-आगे चलते थे। लेकिन अपहरण कांड का खुलासा होते ही तृणमूल के आला नेताओं ने इन दोनों को पहचानने से भी पल्ला झाड़ लिया है। अब परवरिश की बात करें तो 19 वर्ष की अवस्था में एकलौते बेटे को इतनी छूट कि पिता के दोस्तों के साथ बैठकर शराब का ग्लास टकराने से भी झिझक नहीं। सोचने की बात है कि हमारा समाज अब किस दिशा की ओर चल पड़ा है जहां बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

Edited By: Jagran