-चमगादड़ों से परेशान नहीं होते हैं स्थानीय लोग

-कभी भी भगाने की कोशिश नहीं की गई

-काफी मांग के बाद भी जमीन नहीं बेच रहे हैं बागान मालिक

-निपाह वायरस के समय भी लोगों को कोई आपत्ति नहीं हुई थी

-चमगादड़ खाने से भी चीन में कोरोना फैलने का दावा

मोहन झा,सिलीगुड़ी : नोबेल कोरोना वायरस को लेकर पूरी दुनियां आफत में है। इस बीमारी को रोकने के लिए आमलोग आपस में दूरी बना रहे हैं। इसे सोशल डिस्टेंसिंग का नाम दिया गया है। इस बीमारी को एक प्राकृतिक आपदा माना जा रहा है। ऐसे में पशु पक्षियों की क्या बात करें,इंसान-इंसान से दूरी बनाने में लगा है। लेकिन वहीं शहर से सटे आसिघर इलाके के लोगों ने खौफ के इस माहौल में भी बादुर बागान को बचा रखा है। 4जी के इस दौर में जहां जंगलों की कटाई चरम पर है, वहीं बादुरों को रहने के लिए रिहायशी इलाके में जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर जंगल बासाया गया है। यहां आप बादुर को चमगादड़ कह सकते हैं। दरअसल बंगाल में चमगादड़ को ही बादुर कहते हैं। कोरोना के आतंक में भी इस इलाके के लोग बादुरों के साथ मिलजुल रह रहे हैं।

नोबेल कोरोना वायरस ने पूरे विश्व के लोगों को घरबंदी होने पर मजबूर कर दिया है। भारत सरकार ने भी 21 दिनों के लिए पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की है। कोरोना के भय से अधिकांश लोग घरों में दुबक गए हैं। राष्ट्रीय आपदा घोषित यह वायरस पड़ोसी देश चीन की देन है। वहीं वुहान शहर से यह बीमारी फैली और भारत समेत पूरी दुनियां को अपनी चपेट में ले लिया। चीन एक ऐसा देश है, जहां के लोग जंगली, जहरीले जानवरों के साथ, कीड़े-मकोड़े, पक्षी व कीट-पतंगो को भी अपना भोजन बना लेते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि प्रकृति के इस दोहन की वजह से ही कोरोना जैसी आपदा से आज पूरे विश्व को जंग लड़ना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार चमगादड़ों के भक्षण से भी इस तरह की आपदा फैली है। इसके पहले भी वर्ष 2018 में निपाह वायरस का आतंक फैला था। चमगादड़ को निपाह वायरस का वाहक बताया गया था।

ऐसे आतंकित समय में भी आसिघर इलाके के लोग चमगादड़ के साथ मिलजुल कर रहे हैं। जलपाईगुड़ी जिला के अधीन सिलीगुड़ी शहर के पास आसिघर इलाका है। सिलीगुड़ी मेट्रोपोलिटन पुलिस के भक्ति नगर थाना अंतर्गत आसिघर पुलिस चौकी भी है। आसिघर का कुछ इलाका सिलीगुड़ी नगर निगम के 36 नंबर वार्ड तो कुछ हिस्सा डाबग्राम-2 नंबर ग्राम पंचायत के अधीन है। आसिघर मोड़ से करीब एक सौ मीटर की दूरी पर ही बादुर बागान है। बांग्ला में चमगादड़ को बादुर कहा जाता है।

बादुर बागान की जमीन स्थानीय निवासी मंटू राय के नाम है। मंटू राय एक सरकारी मुलाजिम है। आज से करीब 20 वर्ष पहले यहां बांस, साल, सागवान का बागान हुआ करता था। इसी बागान पर चमगादड़ों का बसेरा था। जनसंख्या बढ़ने की वजह से इस बागान की भी कटाई हुई। मंटू राय के पूर्वजों से जमीन खरीद कर काफी लोग यहां बसे। लेकिन इस बागान को पूरी तरह से साफ नहीं किया गया। बल्कि जमीन के एक टुकड़े पर आज भी बांस झाड़, साल व सागवान के कई पेड़ हैं। जहां चमगादड़ों का बसेरा है। इस बादुर बागान के चारों तरह उंची-उंची इमारते खड़ी हो चली है। एक तरह से कहें तो पूरा इलाका भी रिहायशी हो चला है। लेकिन इसके बाद भी यहां के लोगों ने चमगादड़ों को इस बागान से भगाने की पहल नहीं की है। इतना बड़ा कि शरीर सिहर जाए

बादुर बागान में चमगादड़ों की संख्या इतनी है कि नजर दौराने पर पेड़ के पत्तों से अधिक चमगादड़ ही दिखते हैं। बादुर बागान के चमगादड़ों का आकार भी इतना बड़ा है कि देखने से शरीर सिहर उठता है। बड़े आकार वाले ये चमगादड़ दिन भर बागान के पेड़ों की डाल से उल्टे लटके रहते हैं। शोर भी काफी मचाते हैं। रात के समय भोजन की तालाश में निकले चमगादड़ों इलाकाई लोगों के छतों पर मल आदि त्याग कर गंदगी भी फैलाते हैं। लेकिन इसके बाद भी इलाकावासियों ने चमगादड़ों को खदेरने या बादुर बागान का सफाया करने की पहल नहीं की है।

पूरे इलाके के लिए लैंड मार्क

यह बादुर बागान तो एक लैंड मार्क हो चला है। डाक और कुरियर भी बादुर बागान लैंड मार्क से पहुंचता है। इलाकाई लोगों का कहना है कि बादुर बागान से किसी को कोई परेशानी नहीं है। बल्कि यह बागान मंटू राय की पैतृक जमीन पर वर्षो से है। जमीन मालिक परिवार की ओर से भी इस बागान का सफाया करने की जुगत नहीं की गई। वर्ष 2018 में निपाह का आतंक पूरे देश में फैला था। निपाह का वाहक भी चमगादड़ों को ही बताया गया। उस आतंकित दौर में भी बादुर बागान से कोई परेशानी नहीं हुई। बल्कि इस इलाके में निपाह वायरस भी नहीं के बराबर ही फैला था। फिर कोरोना के आतंक में बादुर बागान से भला किसी को क्या परेशानी हो सकती है।

Posted By: Jagran

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस