-शहर के ज्यादातर मंदिरों में की जाएगी अनंत की कथा

- महावीर स्थान में अनंत खरीदने वालों की लगी रही भीड़

जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी : भाद्र पद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। इस वर्ष यह पर्व 12 सितंबर यानि गुरुवार को मनाया जाएगा। इस संबंध में पंडित आचार्य यशोधर झा ने बताया कि

इसके लिए शुभ मुहूर्त सुबह 6:04 मिनट से देर शाम तक है। इसी दिन दस दिनों से चले आ रहे गणेश पूजा का विसर्जन भी किया जाता है। कहते है कि अनंत चतुर्दशी को भगवान विष्णु के पूजा के साथ बांधा जाता है। अनंत चतुर्दशी के दिन ही भगवान ने अपना विशाल व चतुर्दिक रूप दिखाया था। इस दिन विष्णु जी चौदह गाठों वाले डोरे के रूप में कवच देते हैं। इन चौदह गांठों में तल, अतल, वितल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुव:, स्व:, जन, तप, सत्य और मह की रचना की गयी है। इसकी कथा विशुद्ध रूप से महाभारत से जुड़ी है। अपने भाइयों के साथ वन-वन भटकते युधिष्ठिर ने भगवान से कहा कि क्या हमें दुख के अनंत सागर से कभी मुक्ति मिलेगी। श्रीकृष्ण ने इस मुक्ति के लिए उनको अनंत चतुर्दशी का व्रत करने को कहा। इस दिन हल्दी से रंगा चौदह गाठों वाला डोरा दाएं हाथ में बाधा जाता है और पुराने डोरे का विसर्जन किया जाता है। इसी डोरे को विष्णु कवच कहा गया है जो वर्ष भर भक्त की रक्षा करता है। इसकी पूजा के लिए स्नान आदि कमरें से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करें व चौकी आदि को मंडप रूप में परिणित करके भगवान की साक्षात सात फणों वाली शेष स्वरूप अनंत की मूर्ति स्थपित करें। 14 गाठ का अनंत व नवीन आम्र पल्लव, गंध पुष्प, दीप व नैवेद्यादि से पूजन करें। पूजन में पंचामृत पंजीरी, केला व मोदकादि का प्रसाद अर्पण करें। कथा का श्रवण कर ऐसे पदाथरें का सेवन करें जिसमें नमक न पड़ा हो। पुरुष इसे दाहिने हाथ में और महिलाएं बांए हाथ में बांधती है।

Posted By: Jagran

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