-अंतिम सोमवारी को भी नहीं लगेगा भक्तों का तांता

-बाबा भोले को भक्तों ने बांधा रक्षा सूत्र, बार-बार नहीं मिलता ऐसा मौका

जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी :

भगवान भोले शकर की पूजन-अर्चना का महाअनुष्ठान सावन राखी पूर्णिमा के साथ अंतिम सोमवारी व्रत के साथ संपन्न हो जाएगा। श्रावण कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होकर श्रावणी पूर्णिमा तक चलता है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए सुबह से ही मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी थी। भक्त जल, फूल के साथ रेशमी धागों से बने रंग-बिरंगे रक्षा सूत्र अर्थात राखी चढ़ाकर आदि गुरु शिव से अपने भावी जीवन की रक्षा का कुशल मंगल की कामना शहर के सभी प्रमुख मंदिरों में किया जाएगा। श्रावणी पूर्णिमा को पाच दिन पूर्व से विक्रम 10 श्रावण शुक्ल की तिथि से झूलनोत्सव का पर्व प्रारंभ हो गया है। पूर्वोत्तर के सबसे बड़े इस्कान मंदिर में यहां सुसज्जित झूले पर राधा-कृष्ण को झूलाया जा रहा है। जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो रहा है। झूलनोत्सव के साथ ही इसका समापन आज हो गया। लेकिन इससे भक्त दूर है।

बाबा भोलेनाथ पर चढ़ाया जाता है रक्षा सूत्र

बाबा मंदिर के पुजारी व ब्राह्माण पुरोहितगण एक ओर जहा अपने यजमान की रक्षा हेतु बाबा पर रक्षा सूत्र चढ़ाते हैं वहीं दूसरी ओर अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बाधकर उन्हें आशीर्वाद भी देते हैं। स्वभावत :सदैव संसार के सभी चेतन प्राणियों अपनी रक्षा की भावना प्रबल रहती है। अनादि काल से हम अपने आराध्य ईष्ट देवताओं से सभी तरह की आपदा-संकट, रोग व्याधि, कष्ट-क्लेश आदि से मुक्ति हेतु उनके पूजन-अनुष्ठान करते आए हैं। यही कारण है कि हमारे प्रत्येक धार्मिक ग्रंथ में रक्षा कवच के मंत्र है। ये हमें दैनिक संकटों से मुक्ति दिलाने हेतु होते हैं। और जब रक्षा सुरक्षा की बात हो तो भगवान शिव से बड़े रक्षक तो इस भूतल पर कोई हैं ही नहीं।

रक्षा कवच प्रदान करते भोलेनाथ

आचार्य पंडित यशोधर झा का कहना है कि भगवान शकर के महामृत्युंजय जाप के समक्ष किसी संकट की कोई विसात नहीं। फिर अति कृपालु और सामर्थयवान भगवान शिव न सिर्फ हमारे पालनहार बनकर हमें रक्षा कवच प्रदान करते हैं, वरन प्रत्येक प्राणी को अपने अंदर शिवत्व जागृत कर दूसरों के प्रति समरस, दयावान तथा सहृदय बनने के संदेश भी देते हैं। क्योंकि जबतक हम अपने वैमनस्य त्याग कर दूसरों की रक्षा के प्रति निष्ठावान नहीं होंगे, तबतक समस्त समाज व संसार की रक्षा सुनिश्चित हो ही नहीं सकती। तभी तो हमारे धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि शिव बनकर ही शिव की पूजा करें शिवो भूत्वा शिवं यजेत। हमारे अंदर यदि दूसरों के प्रति करुणा की भाव जगती है, तो वही भाव शिव तत्व है। भगवान शिव का यही संदेश है कि जबतक हम दूसरों की भलाई हेतु तत्पर नहीं होते, तब तक शिव की अर्चना सफल नहीं होती।

यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। जितनी देर हम जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ करने के लिए भगवान शकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं। सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ते हैं।

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