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बंगाल में पीएम मोदी की बदली चुनावी पटकथा, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था पर ममता को घेरा

Published: Sun, 05 Apr 2026 11:42 PM (IST)

प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल में अपनी चुनावी रणनीति बदली है। 2021 और 2024 के 'सांस्कृतिक पहचान' के नारों के बजाय, ...और पढ़ें

बंगाल में पीएम मोदी की बदली चुनावी पटकथा। (X- @BJP4India)

बंगाल में पीएम मोदी की बदली चुनावी पटकथा। (X- @BJP4India)

HighLights

  1. मोदी की नई रणनीति: भ्रष्टाचार, कानून का राज मुख्य मुद्दे।

  2. 'बंगाल का पैसा लूटा गया', 'हर भ्रष्टाचारी से वसूली होगी'।

  3. संदेशखाली, मालदा घटनाओं से ममता सरकार पर हमला।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल के चुनावी रण में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने हमलों की धार को इस बार नए सांचे में ढाल दिया है। 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में जहां उनका मुख्य फोकस 'सांस्कृतिक पहचान' और 'सोनार बांग्ला' जैसे नारों पर था, वहीं 2026 में उनका अभियान 'भ्रष्टाचार का हिसाब', 'कानून का राज' और 'संवैधानिक संस्थाओं की सुरक्षा' जैसे ठोस मुद्दों पर टिक गया है।

कूचबिहार के रासमेला मैदान से दिए गए भाषण में मोदी ने जिस तरह 'बंगाल का पैसा लूटा गया' और 'हर भ्रष्टाचारी से वसूली होगी' का संदेश दिया, वह सीधे शासन और जवाबदेही की राजनीति को केंद्र में लाता है।

यह बदलाव पिछले माह विधानसभा चुनाव की घोषणा से एक दिन पहले 14 मार्च को कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान से शुरू हुए अभियान का ही विस्तार है, जहां उन्होंने घुसपैठ से 'रोटी, बेटी और माटी' पर खतरे को मुद्दा बनाया था। हालांकि, चुनाव की घोषणा के बाद उनके हमले अधिक आक्रामक और घटनाक्रम आधारित हो गए हैं।

मालदा के कालियाचक में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना को 'महाजंगलराज' बताकर मोदी ने ममता सरकार पर सीधा हमला बोला। यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और न्यायपालिका की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने की रणनीति है।

मुद्दों को प्रमाणिकता देने की कोशिश2021 और 2024 के मुकाबले 2026 में भाजपा की रणनीति अधिक परिपक्व और बहुस्तरीय दिखती है। पहले जहां भावनात्मक ध्रुवीकरण और वैचारिक अपील प्रमुख थी, अब 'गर्वनेंस बनाम अराजकता' का स्पष्ट फ्रेम तैयार किया जा रहा है। संदेशखाली, आरजीकर मेडिकल और मालदा जैसी घटनाओं के जरिए कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और न्यायपालिका की स्वायत्तता को चुनावी बहस का केंद्र बनाया जा रहा है।

वहीं इन घटनाओं के जरिए मुद्दों को प्रमाणिकता देने की कोशिश भी हो रही है। फिर भी, मोदी के भाषणों में एक निरंतरता बनी हुई है-तृणमूल पर 'तुष्टीकरण', 'घुसपैठ को संरक्षण' और 'संस्थाओं के प्रति अनादर' के आरोप पहले की तरह ही दोहराए जा रहे हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह विमर्श वैचारिक था, अब यह प्रशासनिक और कानूनी संकट के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राजनीतिक तौर पर इसका निहितार्थ गहरा है।

भाजपा इस चुनाव को केवल वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता और कानून के राज की परीक्षा के रूप में पेश कर रही है। 'मोदी की गारंटी' और 'हिसाब भी होगा' जैसे संदेशों के जरिए यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करना होगा।

बंगाल के मौजूदा चुनावी परिदृश्य में यह बदला हुआ नैरेटिव निर्णायक साबित हो सकता है, जहां हर रैली अब एक बड़े राजनीतिक संदेश-भ्रष्टाचार के अंत और कानून के राज की वापसी-को मजबूत करती नजर आ रही है।