इतिहास के पन्नों पर हो रही वर्तमान की सियासत में हमारा भविष्य भी अंधकारमय हो रहा है। पिछले कुछ समय से इतिहास को लेकर वर्तमान में विवाद और सियासत दोनों हो रही है। चाहे विवादित ढांचे का विवाद हो, पद्मावत फिल्म का विरोध हो, भीमा-कोरेगांव में भड़की हिंसा हो या फिर ताजमहल को लेकर आ रहे बयान हो। ये तमाम घटनाएं इतिहास से संबंध रखती हैं लेकिन इन्हें लेकर विवाद वर्तमान में हो रहा है। ऐसा लग रहा है मानो जैसे हम अतीत में ही जी रहे हो या फिर अतीत से बाहर ही नहीं निकलना चाहते हो। इतिहास पढ़ने-पढ़ाने और सुनने-सुनाने का विषय है लेकिन अगर इतिहास भीड़ तय करने लग जाए तो हालात कुछ वर्तमान जैसे ही बन जाते हैं..वैसे अपने देश और समाज की समस्याओं और चुनौतियों को जानना और इनसे छुटकारा पाने के लिए आवाज़ उठाना गलत भी नहीं है, पर दिशाहीन होकर उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनना प्रभावी परिणाम नहीं दे सकता। मामले पर इतिहासकार एस इरफ़ान हबीब से विशेष बातचीत...