विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परंपरा की अनूठी झांकी पेश करती है यह जुड़वा नगरी... कई वर्ष पुराने मंदिरों, खंडहर बनी इमारतों, सरयू नदी के किनारे जीर्ण नावों की लंबी कतारें, जमाने पहले बने घाटों और नवाबों के प्रभाव में पली बढ़ी इन शहरों में एक विलक्षण आकर्षण है। निवृत्ति मार्ग के उन्नायक भगवान ऋषभदेव यदि यहां फले-फूले तो शाश्वत सत्य की पहचान के लिए स्वयं को दांव पर लगाने वाले बुद्ध की देशना भी यहां की आबो-हवा में घुली। शीश पैगंबर की प्राचीन मजार है, इस्लामिक परंपरा में हजरत शीश के साथ उनकी मजार का भी अलहदा स्थान है। अयोध्या में राजा-रानी के दौर के मंदिरों की कतार अब ओझल पड़ती जा रही है। नए जमाने की शैली की इमारतें बन रही हैं। वाल्मीकि रामायण भवन, बिड़ला मंदिर, काठिया मंदिर, जानकीमहल, मानसभवन ट्रस्ट जैसी इमारतें बदलाव की मिसाल हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार राम के वन जाने के बाद भरत ने राजगद्दी पर खड़ाऊं रख दी और स्वयं अयोध्या नगर से दूर इस निर्जन में तपस्या करते हुए राज्य का संचालन किया।