कर्नाटक में मैसूर में दशहरा का शाही अंदाज आज भी बरकरार है। यहां की 406 साल पुरानी परंपरा पूरे दुनिया में मशहूर है। दशहरे पर पैलेस में खास लाइटिंग होती है। मैसूरू के दशहरे में न तो राम होते हैं और न ही रावण, राक्षस महिषासुर का वध करने पर देवी चामुंडा की पूजा के तौर पर यहां दशहरा मनाया जाता है। विजयदशमी के दिन मैसूर की सड़कों पर जुलूस निकलता है. इस जुलूस की खासियत यह होती है कि इसमें सजे-धजे हाथी के ऊपर एक हौदे में चामुंडेश्वरी माता की मूर्ति रखी जाती है. सबसे पहले इस मूर्ति की पूजा मैसूर के रॉयल कपल करते हैं उसके बाद इसका जुलूस निकाला जाता है. यह मूर्ति सोने की बनी होती है साथ ही हौदा भी सोने का ही होता है। इस जुलूस के साथ म्यूजिक बैंड, डांस ग्रुप, आर्मड फोर्सेज, हाथी, घोड़े और ऊंट चलते हैं. यह जुलूस मैसूर महल से शुरू होकर बनीमन्टप पर खत्म होती है. वहां लोग बनी के पेड़ की पूजा करते हैं. माना जाता है कि पांडव अपने एक साल के गुप्तवास के दौरान अपने हथियार इस पेड़ के पीछे छुपाते थे और कोई भी युद्ध करने से पहले इस पेड़ की पूजा करते थे।