छत्तीसगढ़ में छिंदक नागवंशीय राजाओं द्वारा वर्ष 1065 के पहले राजपुर में बनवाए गए महल में चालुक्यों के बाद मराठों ने कब्जा किया था और पूरे 174 साल तक यहां रहते हुए बस्तर रियासत से कर वसूली कर धान नागपुर भेजते रहे। इस महल के भग्नावशेष आज भी राजपुर में विद्यमान है। लोक मान्यता है कि यहां गड़े धन संपत्ति की रक्षा अंतिम नागवंशीय राजा रानी इच्छाधारी नाग नागिन के रूप में करते हैं इसलिए इस खंडहरों की तरफ आने से आज भी ग्रामीण घबराते हैं। पांच अप्रेल 1065 ई. का राजपुर अभिलेख यह प्रमाणित करता है कि नागवंशी बोदरागढ़ नरेश मधुरांतक देव का यहां आधिपत्य था। उसने नरबलि के लिए राजपुर नामक गांव माणिकेश्वरी देवी मंदिर को अर्पित किया था। जब यहां चालुक्य राजाओं का आक्रमण हुआ तो उस दौर के राजा-रानी की महल में हत्या कर दी गई थी। वर्ष 1774 तक यहां चालुक्य राजाओं का कब्जा रहा। इसके बाद नागपुर के भोंसले प्रशासन का यहां कब्जा हो गया और वे यहां करीब दो शताब्दी तक रहे।