दुष्कर्म दंडनीय ही नहीं होते। वे समाज के लिए पीड़ादायक होते हैं। वे राष्ट्र के लिए लज्जा और गहन व्यथा का विषय भी होते हैं। कानून का कठोर होना अच्छी बात है। कानून का भय होना और भी अच्छी बात है, लेकिन समाज का मूकदर्शक हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्रलिखा। वह सशक्त राष्ट्र राज्य के पक्षधर थे। उन्होंने आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दंडनीति  चार विद्या बताई हैं। सांख्य योग आदि दर्शन आन्वीक्षकी हैं। तीन वेद त्रयी है। वार्ताकृषि पशुपालन, खनिज आदि की समृद्धि है। चौथी दंडनीतिकानून है। सबकी उपयोगिता है। मूलभूत प्रश्न है कि हमारा समाज प्रथम तीन की जिम्मेदारी न लेकर केवल दंडनीति से ही भारत को कैसे महान बना सकता है? भारत का मन कभी भी हिंसक नहीं रहा, लेकिन पीछे तीन दशक से यहां हिंसा व तनाव का वातावरण है। जिस विविधता में एकता को हम अपनी ताकत बताते है वर्तमान समय को देखकर लग रहा है कि वो ही हमारे हितकर नहीं लग रही है। दुष्कर्म को भी अब हम धर्म से जोड़कर देखने लगे हैं आखिर कब हमारी बच्चियां सुरक्षित होंगी?