छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय में दुनिया का 52वां शक्ति पीठ स्थित है। इस शक्ति पीठ के विषय में एक प्राचीन कहानी बताई जाती है। कहा जाता है कि सतयुग में जब राजा दक्ष ने यज्ञ कराया तो उन्होंने भगवान शंकर को इसमें आमंत्रित नहीं किया । इस पर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने तांडव नृत्य किया। चूंकि सती राजा दक्ष की पुत्री थीं तो उन्होंने अपने पति के इस अपमान से क्षुब्द होकर अपने पिता के यज्ञ कुंड में खुद की आहुति दे दी थी। जब भगवान शंकर को इस बारे में पता चला तो वह सती का शव अपनी गोद में लेकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने लगे। भगवान शिव के इस क्रोधित रूप से प्रलय की आशंका को देखते हुए भगवान विष्णु ने चक्र चलाया और सति के शव को खण्डित कर दिया। इस दौरान जिन-जिन स्थलों पर सती के अवशेष गिरे, वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई। उनमें से दंतेवाड़ा एक है। कहा जाता है कि यहां सती के दांत गिरे थे।

वहीं दंतेश्वरी मंदिर  के प्रधान पुजारी हरेंद्रनाथ जिया कहते हैं कि शारदीय व चैत्र नवरात्रि पर हर साल यहां हजारों मनोकामनाएं ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं। हजारों भक्त पदयात्रा कर शक्तिपीठ पहुंचते हैं। दंतेश्वरी मंदिर प्रदेश का एकमात्र ऐसा स्थल है जहां फागुन माह में 10 दिवसीय आखेट नवरात्रि भी मनाई जाती है, जिसमें हजारों आदिवासी शामिल होते हैं

केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए यह स्थल पहले दंतेवला और अब दंतेवाड़ा के नाम से चर्चित है। नदी किनारे आठ भैरव भाइयों का आवास माना जाता है, इसलिए यह स्थल तांत्रिकों की भी साधना स्थली है। कहा जाता है कि यहां आज भी बहुत से तांत्रिक पहाड़ी गुफाओं में तंत्र विद्या की साधना कर रहे हैं। यहां नलयुग से लेकर छिंदक नाग वंशीय काल की दर्जनों मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। मां दंतेश्वरी को बस्तर राज परिवार की कुल देवी माना जाता है, परंतु अब यह समूचे बस्तरवासियों की अधिष्ठात्री हैं ।

मां दंतेश्वरी का मंदिर को देश का 52वां शक्तिपीठ माना जाता है। यहां सबसे प्राचीन मंदिर का निर्मांण अन्न्मदेव ने करीब 850 साल पहले कराया था। डंकिनी और शंखिनी नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर का जीर्णोद्धार पहली बार वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के राजाओं ने करीब 700 साल पहले करवाया था। 1883 तक यहां नर बलि होती रही है। 1932-33 में दंतेश्वरी मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार तत्कालीन बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने कराया था।