जब आप सफेद रण के इस आपार विस्तार में खुद को पाते हैं तो अचानक जिंदगी ठहर जाती है। जैसे मैं यहां आकर ठहर गया।  ऐसा लगा जैसे ये कहानी नमक की नहीं, बल्कि हमारे जीवन की है। ये रण जीवन है। सदियों पुरानी कहानियों और रहस्यों को अपनी गोद में छिपाकर बैठा है। इस रण में सिकंदर से लेकर गांधी की वह कहानियां हैं जो आज इतिहास के पन्ने में दर्ज हैं। यहां का नमक समय पड़े तो बगावत को स्वाद देने के काम में आता है और एक दुबला पतला शख्स इसे मुट्ठी में दबाए दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क को चुनौती दे देता है।  यह कहानी गांधी की है, जो भूतकाल की थी लेकिन इस रण का वर्तमान आज बगावत या आंदोलन का नहीं, सपनों का है। उन आम सपनों का जो इस सफेद रेत में मेहनत कर जुगुनुओं की तरह टिमटिमा रहे हैं।