मनोज बाजपेयी हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में शामिल हैं, जो कलाकार और किरदार के बीच के फ़ासले को मिटा देते हैं। ‘सत्या’ का गैंगस्टर भीखू म्हात्रे हो या ‘सत्यमेव जयते’ का डीसीपी शिवांश राठौड़, पर्दे पर उन्हें देखकर लगता है कि मनोज बाजपेयी से बेहतर इस चरित्र को कोई निभा ही नहीं पाता। एक अभिनेता के तौर पर मनोज बाजपेयी अगर मिसाल हैं, तो ऐसे लोगों के लिए मशाल से कम नहीं, जो पर्दे पर चमकने का सपना आंखों में लेकर किसी दूर-दराज के गांव या क़स्बे से मुंबई पहुंचते हैं। एक उम्मीद का नाम हैं मनोज बाजपेयी कि हुनर किसी सरनेम या ख़ास परिवार का मोहताज नहीं होता। टैलेंट है तो देर-सबेर मंज़िल ज़रूर मिलेगी। हालांकि मनोज आज जिस मुक़ाम पर हैं, वहां तक पहुंचना आसान नहीं होता। संघर्ष के एक लंबे और थका देने वाले रास्ते को पैरों से रौंदते हुए मनोज इस मंज़िल तक पहुंच सके हैं कि आज वो हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का एक भरोसेमंद नाम बन चुके हैं। ‘लाइट्स कैमरा एक्शन’ के इस एपिसोड में जागरण डॉट कॉम के एंटरटेनमेंट एडिटर पराग छापेकर से बातचीत में मनोज बाजपेयी ने शुरुआती संघर्ष और चुनौतियों पर खुलकर बात की है। मनोज की फ़िल्म ‘गली गुलियां’ सिनेमाघरों में है। कई अंतर्राष्ट्रीय समारोह में सराही जा चुकी ‘गली गुलियां सिनेमा’ के क्षेत्र में क्यों एक आंदोलन की तरह है, इस पर भी मनोज ने रौशनी डाली है। मनोज और अच्छे सिनेमा की चाहत रखने वालों के लिए और भी बहुत कुछ है ‘लाइट्स कैमरा एक्शन’ के इस एपिसोड में।