उत्‍तरकाशी [शैलेंद्र गोदियाल]। हिमालय की वादियां दूर से जितनी सुंदर दिखती हैं, करीब जाने पर उतनी ही विकट परिस्थितियों से सामना होता है। सबसे अधिक मुश्किलें यहां मौसम और रास्तों के कारण पेश आती हैं। ऐसे में आप हिमालय की इन बियाबान वादियों में भटक गए तो रास्ते की दिशा बताने वाला कोई नहीं होता। तब पथ प्रदर्शक बनते हैं मोरेन (चट्टान) के ऊपर रखे पांच पत्थर।

ये मूक पथप्रदर्शक हर दस से बीस मीटर के फासले पर मिलते जाएंगे। इनके सहारे कोई अनजान व्यक्ति भी हिमालय की वादियों की सैर कर सकता है। ट्रैकिंग और पर्वतारोहण की भाषा में पांच पत्थरों के इस ढेर को ‘कैरन’ कहते हैं। पर्वतारोहण के बेसिक एवं एडवांस कोर्स में इन पांच पत्थरों के बारे में पढ़ाया-सिखाया जाता है।

इन पांच पत्थरों के बारे में विस्तार से चर्चा करें, इससे पहले हिमालयी क्षेत्र में ट्रैकिंग और पर्वतारोहण के रास्तों पर नजर डाल लेते हैं। हिमालयी क्षेत्र में गंगोत्री से बदरीनाथ को जोड़ने वाला कालिंदी ट्रैक दुनिया के सबसे ऊंचे (5992 मीटर) और लंबे ट्रैक (120 किमी) में से एक है। गंगोत्री से 18 किमी दूर गोमुख तक वन विभाग ने आवाजाही के लिए रास्ता बनाया हुआ है। लेकिन गोमुख से आगे जाने के लिए पत्थर, मलबे के ढेर, मोरेन और क्रेवास (ग्लेशियर की दरार) को पार करना होता है। किस दिशा में आगे बढ़ना है, इसका अंदाजा केवल प्रशिक्षित गाइड ही लगा सकता है। 

इसलिए प्रशिक्षित गाइड की जिम्मेदारी होती है कि वह हर दस से बीस मीटर के फासले पर किसी बड़े पत्थर के ऊपर पांच पत्थरों का ढेर बनाए। हर एक फासले पर पत्थरों को एक के ऊपर एक रखा जाता है। ताकि पीछे से आने वाले ट्रैकर और पोर्टर इन पांच पत्थरों के सहारे आगे बढ़ते रहें। नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) उत्तरकाशी के सीनियर इंस्ट्रक्टर एसएस भंडारी बताते हैं कि पर्वतारोहण के बेसिक और एडवांस कोर्स में माउंटेन टर्मिनोलॉजी के तहत कैरन की उपयोगिता के बारे में पढ़ाया जाता है। उच्च हिमालयी ट्रैकिंग में पथ-प्रदर्शन के लिए यह महत्वपूर्ण तकनीक है। 

'हर ट्रैकिंग मार्ग पर मिलेगें

एवरेस्ट विजेता एवं प्रशिक्षित गाइड विष्णु सेमवाल बताते हैं कि हिमालय में छोटी ट्रैकिंग से लेकर पर्वतारोहण तक कैरन का उपयोग होता है। गंगोत्री हिमालय में कालिंदी पास, तपोवन, नंदन वन, वासुकीताल, सुंदरवन, रक्तवन, गंगोत्री-उड़नकोल-खतलिंग, केदार ताल आदि ट्रैकिंग रूट पर कैरन का उपयोग होता है।

जब भटक जाता है कोई ट्रैकर 

उच्च हिमालयी क्षेत्र में रास्ता न होने के कारण कुछ ही दूरी तय करने में लिए ट्रैकर भटक जाता है। इससे ट्रैकर का समय ही नष्ट नहीं होता, ऊर्जा भी जाया होती है। लिहाजा, समय और ऊर्जा की बचत के लिए जरूरी है कैरन के सहारे आगे बढ़ना।

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Posted By: Sunil Negi

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