शैलेंद्र गोदियाल, उत्तरकाशी

जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से 50 किलोमीटर दूर जखोल ग्राम पंचायत के लऊ गांव में सामुदायिक जल प्रबंधन के तहत ग्रामीणों को पर्याप्त पानी मिल रहा है। यह ग्रामीणों के हलक तर करने के साथ ही मवेशियों और किचन गार्डन की सिचाई की जरूरत भी पूरी कर रहा है। ग्रामीणों ने गांव की मां दुर्गा ग्राम कृषक समिति के पास दस हजार रुपये की धनराशि भी एकत्र की है, जिससे भविष्य में लाइन की मरम्मत के लिए जरूरी सामान ला सकें।

भटवाड़ी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले जखोल ग्राम पंचायत से डेढ़ किलोमीटर दूरी पर लऊ गांव स्थित है। यहां मौसम अनुकूल और जंगल निकट होने के कारण 18 परिवार वर्षभर मवेशियों के साथ रहते हैं। इन ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय दुग्ध उत्पादन है। इन दिनों गांव से 45 लीटर दूध प्रतिदिन दुग्ध उत्पादन समिति की आंचल डेयरी को जा रहा है। जबकि, बरसात और शीतकाल के दौरान ग्रामीण 120 लीटर दूध प्रतिदिन बेचते हैं। वर्ष 2018 से पहले गांव के 18 परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट पानी का था। ग्रामीण डेढ़ किलोमीटर दूर जखोल गांव से खुद के लिए और मवेशियों के लिए पानी सिर और पीठ पर ढोकर ले जाते थे। ग्रामीणों की समस्या जानने के बाद रिलायंस फाउंडेशन के कमलेश गुरुरानी ने ग्रामीणों के साथ मिलकर पेयजल योजना बनाने के लिए बैठक की। लऊ गांव से दो किलोमीटर दूर छडानी तोक से पेयजल योजना बनाने के लिए ग्रामीणों ने श्रमदान किया। पेयजल योजना तैयार करने का जरूरी सामान और तकनीकी ज्ञान रिलायंस फाउंडेशन ने दिया। अक्टूबर 2018 में पेयजल योजना तैयार हुई। पानी के सुचारू संचालन के लिए दस हजार लीटर का एक टैंक भी बनाया गया। वर्ष 2018 से हर घर में पर्याप्त पानी पहुंच रहा है। इससे ग्रामीण अपने किचन गार्डन की सिचाई भी कर रहे हैं। इसके साथ ही मटर, गोभी, प्याज, राई, पालक, आलू आदि का उत्पादन कर उसे बेच भी रहे हैं।

इस पेयजल योजना के संचालन के लिए बनाई गई मां दुर्गा ग्राम कृषक समिति की अध्यक्ष कुसुमलता रमोला कहती हैं कि पानी के संकट की पीड़ा पहाड़ में महिलाओं से बेहतर कोई नहीं जानता है। उनके गांव में भी महिलाओं को ही पानी ढोना पड़ता था। लेकिन, जबसे उनकी खुद की पेयजल योजना बनी है तबसे पानी ढोने का बोझ खत्म हो गया है। हर घर के पास अपना पानी का नल होने से बड़ी सहूलियत भी मिल रही है। गांव के सुभाष चंद रमोला कहते हैं कि श्रमदान से बनाई गई पेयजल योजना से उन्हें कई तरह के लाभ हैं। पानी के लिए उन्हें किसी तरह का टैक्स नहीं देना पड़ता है। पेयजल योजना को गांव का हर व्यक्ति अपनी धरोहर समझ कर संरक्षित करता है। आगे भविष्य में अगर पेयजल योजना की मरम्मत की स्थिति आती है तो ग्रामीण श्रमदान करेंगे।

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पेयजल संकट से निपटने के लिए जखोल के लऊ गांव के ग्रामीणों के पास सामुदायिक पेयजल योजना का स्वामित्व है। पेयजल संकट से जूझ रहे पहाड़ में इससे बेहतर जल प्रबंधन कुछ और नहीं है। पेयजल संकट से निकलने के लिए इस तरह की सामुदायिक भागीदारी जरूरी है।

कमलेश गुरुरानी, परियोजना निदेशक, रिलाइंस फाउंडेशन

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