संवाद सहयोगी, उत्तरकाशी : हिमालय की उपेक्षा को लेकर पर्यावरण प्रेमियों में नाराजगी है। नदी बचाओ आंदोलन के संयोजक सुरेश भाई ने कहा कि संसद में हिमालय के 11 राज्यों से कुल 40 सांसद चुनकर जाते हैं। जो अकेले बिहार राज्य के बराबर हैं। बावजूद इसके हिमालयी राज्यों की उपेक्षा की जा रही है।

शनिवार को सुरेश भाई ने जारी विज्ञप्ति बयान में कहा कि आजादी के 70 वर्ष बीतने के बावजूद भी हिमालय के अनुरूप विकास की रूपरेखा नहीं बनी है। केंद्र अपने भाषणों में यहां के जल, जमीन, जंगल के विकास की बात करता है। लेकिन धरातल पर किए गए कार्य इसके बिल्कुल विपरीत नजर आते हैं। उन्होंने कहा कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने सेहिमालय के विकास मॉडल की उम्मीद जगी थी। इसके लिए बकायदा उन्हें हजारों हस्ताक्षरों के साथ हिमालय नीति बनाने के लिये सरकारी आंकडों के साथ एक दस्तावेज भी सौंपा गया है। लेकिन उनकी सरकार पांचवे साल में पहुंचने वाली है और हिमालय के सवाल आज भी पूर्व की भांति मुंह बहाए खड़े हैं। इस दौरान गंगा की अविरलता के सवालों की अनदेखी तो हुई है। साथ ही हिमालय के प्रति कोई गम्भीरता नहीं दिखाई गई है। वे कहते हैं कि 17 मार्च 1992 को योजना आयोग के विशेषज्ञों ने भी डॉ. जेएस कासिम की अध्यक्षता में हिमालय विकास प्राधिकरण का खाका तैयार किया गया था। जिसे बाद में ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

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