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पंतनगर विश्वविद्यालय की बड़ी सफलता: आईवीएफ तकनीक से साहीवाल गाय ने दिया बद्री बछिया को जन्म, नस्ल संरक्षण में मिलेगी मदद

Published: Fri, 11 Sep 2026 06:35 PM (GMT+05:30)

पंतनगर विश्वविद्यालय और एनडीआरआई करनाल ने ओवम पिक-अप (ओपीयू)-इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक से साहीवाल गाय में बद्री भ्रूण प्रत्यारोपित कर बद्री बछिया के जन्म में सफलता पाई है।

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जागरण संवाददाता, पंतनगर। बद्री गाय के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पशुचिकित्सा महाविद्यालय और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआइ) करनाल की संयुक्त टीम ने ओवम पिक-अप (ओपीयू)-इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) तकनीक से तैयार बद्री भ्रूण को साहीवाल गाय में प्रत्यारोपित कर बद्री नस्ल की बछिया का जन्म कराने में सफलता पाई है।

साहीवाल गाय ने शुक्रवार को सुबह तीन बजकर 10 मिनट पर उत्कृष्ट गुणों वाली बद्री बछिया को जन्म दिया। उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी के वित्तपोषण से चल रही इस परियोजना पर वैज्ञानिक पिछले तीन वर्षों से काम कर रहे हैं।

प्रक्रिया के तहत पंतनगर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक डेयरी फार्म की उत्कृष्ट बद्री गायों से ओपीयू तकनीक के माध्यम से अंडाणु लिए गए। इन्हें प्रयोगशाला में परिपक्व करने के बाद उत्तराखंड लाइवस्टाक डेवलपमेंट बोर्ड से प्राप्त उत्कृष्ट बद्री गाय के वीर्य से आइवीएफ कराया गया।

सात दिन तक नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में विकसित करने के बाद तैयार बद्री भ्रूणों को साहीवाल और संकर गायों के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार संकर नस्ल की एक अन्य गाय भी अगले पांच से सात दिनों में बद्री बछड़े को जन्म दे सकती है।

परियोजना के तहत अधिक दुग्ध उत्पादन वाली उत्कृष्ट बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी काम चल रहा है। टीम अब तक तीन-चार चरणों में बद्री गाय के क्लोन भ्रूण तैयार कर चुकी है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा लाभ

कुलपति डा. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने शैक्षणिक डेयरी फार्म पहुंचकर वैज्ञानिकों की टीम को बधाई दी। कहा कि बद्री उत्तराखंड की एकमात्र पंजीकृत गाय की नस्ल है, इसलिए इसका संरक्षण और संवर्धन बेहद महत्वपूर्ण है।

ओपीयू-आईवीएफ और क्लोनिंग जैसी तकनीकों से उत्कृष्ट आनुवंशिक गुणों वाली बद्री गायों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इससे भविष्य में पशुपालकों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

अनुसंधान में पशु मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग के डा. शिव प्रसाद, डा. सुनील कुमार व डा. मृदुला शर्मा, एनडीआरआइ के डा. नरेश एल. सलोकर, डा. एमके सिंह व डा. संजय शर्मा का योगदान रहा।

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