किच्छा, ऊधमसिंह नगर[जेएनएन]: विपदा की घड़ी में राहत व बचाव का जिम्मा संभालने वाले एसडीआरएफ में कार्यरत चुकटी देवरिया के लाल मनोज जोशी ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। एसडीआरएफ का 15 सदस्यीय दल इस ऐतिहासिक पल का गवाह रहा। एवरेस्ट फतह का सपना हर माउंटेनियर का सपना होता है, लेकिन सभी सफल नहीं हो पाते। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गांव चुकटी देवरिया के जाबांज युवक मनोज ने इस सपने को पूरा कर दिखाया। नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग उत्तरकाशी से ट्रेनिंग हासिल करने के बाद से ही मनोज जोशी राज्य आपदा राहत फोर्स (एसडीआरएफ) में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 

केदारनाथ आपदा के बाद मनोज ने जाबांजी का परिचय देते हुए अपनी टीम के साथ शवों को मलबे से निकाल कर उनके अंतिम संस्कार में योगदान दिया था। माउंट एवरेस्ट पर फतह के लिए एसडीआरएफ देहरादून की 15 सदस्यीय टीम आइजी संजय गुंज्याल के दिशा निर्देशन में सात अप्रैल को काठमांडू पहुंची थी। 

 

वहां से 18 मई को 5300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप पहुंची। 6100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लबूचे पीक तक आइजी गुंज्याल का भी साथ मिला था। उसके बाद का सफर बेहद कठिन और चुनौती भरा था तो चार और सदस्य आगे नहीं बढ़ सके। यहां से दो टीमों का गठन किया गया।  

पहली टीम ने 20 मई व दूसरी टीम ने 21 मई को माउंट एवरेस्ट पहुंच गई। दो जून को देहरादून लौट टीम से शुक्रवार को सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत मिले और उनकी कामयाबी पर पीठ थपथपाई। 

बाबा केदार का मिला आशीर्वाद 

मनोज अपनी इस उपलब्धि का श्रेय बाबा केदारनाथ को देते है। मनोज का कहना है कि केदारनाथ आपदा के दौरान बचाव कार्य के दौरान जो आत्मविश्वास बढ़ा था उसके परिणामस्वरूप ही वह माउंट एवरेस्ट को फतह करने का सपना अपने मन मस्तिष्क में संजोए रखे और सफल भी हो गए। 

डेढ़ माह के प्रशिक्षण में हासिल की उपलब्धि 

मनोज जोशी ने बताया कि अमूमन विदेशियों को एक वर्ष के करीब का समय प्रशिक्षण में लग जाता है, लेकिन उन्होंने मात्र डेढ़ माह के प्रशिक्षण में ही माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने का काम किया। फतह के बाद वहां पर खड़े रह पाना असंभव होता है। सात मिनट तक वह वहां पर खड़े रहे और उसके बाद वापस लौट आए।   

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