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1968 में दोस्त को किराए पर दी दुकान... आज भी महीने का किराया 50 रुपये, कोर्ट ने किया बेदखल

Published: Wed, 28 Oct 2026 04:52 PM (IST)Updated: Wed, 28 Oct 2026 04:56 PM (IST)

काशीपुर की सिविल जज पूनम टोडी की कोर्ट ने 1968 से 50 रुपये मासिक किराए पर चल रही दुकान से ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

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गणेश पांडे, काशीपुर। सिविल जज पूनम टोडी की कोर्ट ने महाराणा प्रताप चौक पर स्थित 58 साल पुरानी दुकान के मामले में संजय कुमार व अन्य बनाम हरजिंदर सिंह व अन्य में बेदखली की डिक्री जारी की है।

कोर्ट ने 1968 से चली आ रही 50 रुपये महीने की किरायेदारी खत्म करते हुए प्रतिवादियों को एक माह में दुकान खाली करने और तीन साल का बकाया 1800 रुपये अदा करने का आदेश दिया है।

दुकान के मूल मालिक जगन्नाथ ने 1968 में सुरजीत सिंह को 50 रुपये पर दुकान दी थी। 2009 में दोनों की मौत के बाद उनके बेटे संजय, अनिल, ललित और हरजिंदर, सुखविंदर मालिक-किरायेदार बने।

मालिक पक्ष ने छह अगस्त 2023 को नोटिस भेजकर सात सितंबर 2023 को किरायेदारी समाप्त की। वादी का दावा था कि जनवरी 2009 से अगस्त 2023 तक 176 माह का 8800 रुपये बकाया है। किरायेदारों ने 10500 रुपये के तीन ड्राफ्ट भेजे, जिसे मालिकों ने यह कहते हुए लौटा दिया कि बकाया 8800 ही है, एडवांस भेजने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने माना कि बकाया है पर लिमिटेशन के कारण केवल अक्टूबर 2020 से सितंबर 2023 तक का ही 1800 रुपये वसूला जा सकता है।

बचाव पक्ष का 10 हजार एडवांस का दावा टिक नहीं पाया। हरजिंदर ने कहा पैसे संजय को दिए, सुखविंदर ने कहा ललित को दिए और गवाह कमलजीत ने कहा पास की डेरी से 2000 उधार लेकर दिए। कोर्ट ने कहा बयान विरोधाभासी हैं, कोई रसीद नहीं, इसलिए एडवांस साबित नहीं।

10 रुपये रोज हर्जाने की मांग पर कोर्ट ने कहा जब किराया ही 50 रुपये महीना है तो पांच रुपये रोज ही न्यायोचित है। वादी की ओर से अधिवक्ता प्रदीप अग्रवाल व प्रतिवादी की ओर से सुरेंद्र सक्सेना ने पैरवी की।

दोस्ती अपनी जगह, कानून अपनी जगह

वाद में मानवीय पहलू भी सामने आया। वादी संजय, अनिल, ललित के पिता जगन्नाथ व प्रतिवादी हरजिंदर, सुखविंदर के पिता सुरजीत सिंह गहरे दोस्त थे। तभी 1968 में जो दुकान 50 रुपये पर दी, उसका किराया दोनों की मौत 2009 तक वही रहा।

प्रतिवादियों ने कहा कि मालिक दुकान एटीएम के लिए ऊंचे किराए पर देना चाहते हैं, जबकि उनकी रोजी-रोटी इसी दुकान से है और 15 लाख का पर्सनल लोन लिया है। कोर्ट ने कहा- दोस्ती अपनी जगह, कानून अपनी जगह।