वीरेंद्र भंडारी, रुद्रपुर

इंसान ही नहीं, प्रेम की भाषा जानवर भी समझते हैं। तभी तो ¨पकी को जंगल नहीं भाया, वह लौटकर अपने घरौंदे यानी संजय वन में आ गई। लोगों के बीच घुल-मिलकर रहना इस हिरनी की आदत बन गई है। हालांकि कई बार वन विभाग ने उसे टांडा जंगल में छोड़ा भी, लेकिन वह हर बार वापस आ गई।

टांडा जंगल में बने संजय वन को पर्यटक स्थल बनाने के लिए वन विभाग ने जू का स्वरूप दिया था। इसके लिए संजय वन में हिरन, खरगोश, मोर समेत अन्य जानवर रखे गए थे। डेढ़ साल पहले वन विभाग ने सभी जानवरों को टांडा जंगल में छुड़वा दिया था। इसके बाद संजय वन में केवल मोर ही कभी कभार दिखते थे। छह माह पहले संजय वन में जंगल से भटककर एक चार साल की हिरनी पहुंच गई। संजय वन में घूमने आने वाले लोगों से उसे प्यार और भोजन मिलने लगा। इससे वह इंसानों से घुल-मिल गई। वन कर्मियों ने उसका नाम प्यार से ¨पकी रख दिया। आवाज देने पर वह लोगों के पास आने लगी। वन कर्मचारियों के मुताबिक कई बार ¨पकी को संजय वन से सटे टांडा जंगल में छोड़ा गया, लेकिन वह हर बार वापस पहुंच जाती है। वर्जन::::

संजय वन में रह रही मादा हिरन इंसानों से घुल-मिल गई है। कई बार उसे जंगल छोड़ा गया। वह हर बार लौटकर संजय वन में आ गई।

-मनोज मेलकानी, वन दरोगा, संजय वन

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