रुद्रप्रयाग, बृजेश भट्ट। विश्वप्रसिद्ध धाम केदारबाबा की उत्सव डोली यात्रा पूरी केदारघाटी के लोगों की भावनाओं से जुड़ी है। कपाट खुलने के मौके पर पूरी केदारघाटी के लोग जिस तरह अपनी घर की बेटी को विदाई देते हैं, उसी प्रकार भोले बाबा को छह महीने के लिए कैलाश जाने की विदाई नम आंखों से देते हैं। कैलाश रवाना होते समय जिस स्थानों से भगवान की डोली गुजरती हैं, वहां की महिलाए मांगलिक गीतों से विदाई देते हैं।

उत्सव डोली यात्रा की परंपरा केदारघाटी के लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। छह माह के लिए अपने के बिछुड़ने का भाव इन लोगो के चेहरों का भाव साफ देखा जा सकता है। छह महीने तक केदार बाबा के वापस लौटने का इंतजार रहता है। मिलन का यह क्षण काफी भावुक होने के साथ ही उत्साहभरा रहता है। 

मांगलिक गीतों व फूलों से यहां के हर उम्र की महिलाएं, बुजर्ग व बच्चे केदार बाबा को विदाई देते हैं। सदियों से केदार बाबा के ग्रीष्मकाल में उच्च हिमालय में स्थित केदारपुरी में रहने हैं, तथा शीतकाल में केदारघाटी के लोगों के बीच ओंकारेश्वर मंदिर में रहने की परंपरा है। 

केदारघाटी भोले बाबा को अपना ईष्टदेव मानने के साथ अपना परिवार का सदस्य मानते हैं। यही कारण है कि जब भोले बाबा की उत्सव डोली केदारपुरी जाती है तो यहां के लोग भोले बाबा को भावुक दिल से विदा करते हैं। छह माह तक भोले बाबा केदारनाथ में विश्राम कर भक्तों को दर्शन देते हैं। 

शीतकाल में विश्राम करने के बाद वापस ओंकारेश्वर मंदिर आने की परंपरा है। बाबा के वापस घर आने पर केदारघाटी के भक्त गर्भजोशी से स्वागत करते हैं। तीर्थपुरोहित श्रीनिवास पोस्ती बताते हैं कि केदार बाबा की उत्सव डोली यात्रा केदारघाटी के लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यह भोले बाबा से मिलन का आनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है।

62 किमी लंबी है उत्सव डोली यात्रा

केदारनाथ की उत्सव डोली यात्रा लगभग 62 किमी लंबी है। तीन पड़ावो में रात्रि विश्राम करने के बाद भगवान की डोली पूरी केदारघाटी से विदाई लेती है। प्रथम पड़ाव के रूप में पहले दिन ऊखीमठ से चलकर फाटा में विश्राम करती है, जबकि दूसरे पड़ाव में गौरीकुंड व तीसरे पड़ाव के लिए वह केदारनाथ पहुंच जाती है, मंदिर में अगले दिन लग्नानुसार पूरे विधिविधान से पूजा अर्चना के बाद विराजमान होती है।

लोगों की भावनाओं से जुड़ी है यात्रा 

बदरी-केदार मंदिर समिति के कार्यधिकारी एनपी जमलोकी के अनुसार, केदारनाथ डोली यात्रा की परंपरा पौराणिक है। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है। छह महीने भगवान केदारपुरी में निवास करते हैं, जबकि शीतकाल के छह महीने ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में प्रवास करते हैं। यह यात्रा लोगों की जुड़ी हुई है। जिसमें मांगलिक गीतों से डोली की विदाई की दी जाती है।

तुंगनाथ रवाना हुई तृतीय केदार की उत्सव डोली

पंचकेदारों में शामिल तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट खोलने की प्रक्रिया भी आरंभ हो गई है। शीतकालीन गद्दीस्थल मार्कंडेय मंदिर मक्कूमठ के गर्भगृह से बाबा तुंगनाथ की भोगमूर्ति को सभामंडप में विराजमान किया गया। इसके बाद पुजारी ने डोली का शृंगार कर बाबा को भोग लगाया। 

स्थानीय ग्रामीणों ने भी बाबा को पारंपरिक पकवानों का अघ्र्य अर्पित किया और फिर डोली रात्रि विश्राम के लिए मक्कू गांव से करीब एक किमी दूर भूतनाथ मंदिर के लिए रवाना हुई। गुरुवार को यहां से डोली चोपता के लिए प्रस्थान कर गई। शुक्रवार दस मई की सुबह तुंगनाथ मंदिर परिसर पहुंचेगी। यहां मंदिर की एक परिक्रमा करने के बाद दोपहर 12 बजे पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। 

इस मौके पर मठापति रामप्रसाद मैठाणी, अतुल मैठाणी, प्रबंधक प्रकाश पुरोहित, राजेंद्र भंडारी, कीरत सिंह व अजय आनंद नेगी समेत मंदिर समिति के कर्मचारी एवं हक-हकूकधरी मौजूद रहे।

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Posted By: Bhanu

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