हिमालयी फल में खोजा बैक्टीरिया-फंगस से लड़ने वाला फॉर्मूला, उत्तराखंड के वैज्ञानिकों को मिली बड़ी सफलता
हिमालयी फल सी-बकथार्न का उपयोग कर उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण से लड़ने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है।
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हिमालयी फल में खोजा बैक्टीरिया-फंगस से लड़ने वाला फार्मूला।
HighLights
सी-बकथार्न से बैक्टीरिया-फंगस रोधी नैनो कण विकसित।
ग्रीन सिंथेसिस तकनीक से बने पर्यावरण अनुकूल टाइटेनियम डाइऑक्साइड नैनो कण।
अस्पतालों, दवाओं और जल शोधन में संभावित उपयोग।
दीपक कापड़ी, पिथौरागढ़। हिमालयी क्षेत्र का औषधीय फल सी-बकथार्न अब केवल पोषण और स्वास्थ्यवर्धक गुणों तक सीमित नहीं रहेगा। उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने इसी फल की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण से लड़ने के लिए एक प्रभावी वैज्ञानिक हथियार साबित हो सकती है।
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बेरीनाग सहित राज्य के विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं ने सी-बकथार्न के अर्क से टाइटेनियम डाइआक्साइड के विशेष नैनो कण तैयार किए हैं, जिन्होंने प्रयोगशाला परीक्षणों में खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस को नष्ट करने की क्षमता दिखाई है।
शोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नैनो कणों के निर्माण में किसी हानिकारक रसायन का उपयोग नहीं किया गया। वैज्ञानिकों ने सी-बकथार्न के प्राकृतिक अर्क के माध्यम से ग्रीन सिंथेसिस तकनीक अपनाई, जिससे पूरी प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल रही।
परीक्षण के दौरान इन नैनो कणों को ई-कोलाई और कैंडिडा एल्बिकंस जैसे संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों पर परखा गया। परिणामों में पाया गया कि प्रकाश के संपर्क में आने पर ये नैनो कण सक्रिय होकर ऐसे मुक्त कण उत्पन्न करते हैं, जो सूक्ष्मजीवों की कोशिकाओं और डीएनए को क्षतिग्रस्त कर उन्हें नष्ट कर देते हैं। इससे संक्रमण फैलाने वाले जीवाणु और फंगस प्रभावी रूप से खत्म हो जाते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग भविष्य में अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण, रोगाणुरोधी दवाओं के विकास, चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा तथा पेयजल शोधन प्रणालियों में किया जा सकता है। यदि आगे के परीक्षण सफल रहे तो हिमालयी जैव संपदा पर आधारित यह शोध स्वास्थ्य और पर्यावरण क्षेत्र में नई संभावनाओं का आधार बन सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली शोध को मान्यता
पिथौरागढ़। इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है। शोध पत्र को वेब ऑफ साइंस इंडेक्स से मान्यता प्राप्त प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जर्नल ऑफ माउंटेन रिसर्च ने प्रकाशन के लिए स्वीकृत कर लिया है।
यह शोध मनोज प्रसाद टम्टा ने डां महेश चंद्र विश्वकर्मा और डा. बालम सिंह बिष्ट मार्गदर्शन में किया है। शोध दल में डा. प्रमोद सिंह खाती, डॉ. राजेश कुमार और डा. प्रियंका तिवारी शामिल रहे।
