धारचूला, पिथौरागढ़ [जेएनएन]: कैलास-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर व्यास घाटी के बूंदी गांव में बारह वर्ष बाद कुंभ की तर्ज पर किर्जी भामौ उत्सव मनाया जाएगा। हालांकि, प्रकृति उत्सव की राह में बाधा बनी है, फिर भी उत्सव को मनाने के लिए लोग बड़ी तादाद में बूंदी गांव पहुंच चुके हैं। उत्सव आज से शुरू होगा।

उच्च हिमालयी क्षेत्र में जटिल भूगोल के बावजूद पर्व-उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। खासकर चौदास में कंडाली और व्यास में किर्जी भामौ उत्सव का नजारा तो देखने लायक होता है। कुंभ की तर्ज पर बारह वर्ष बाद मनाए जाने वाले ये दोनों ही पर्व विजय के प्रतीक हैं। दोनों पर्वों में रिल और तलवार से दुश्मन का प्रतीक मानी जाने वाली वनस्पति को नष्ट किया जाता है। इस बार बूंदी गांव में आज से किर्जी भामौ उत्सव मनाया जा रहा है। जिसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

उच्च और उच्च मध्य हिमालय में होती है किर्जी

उच्च और उच्च मध्य हिमालय में बारह वर्ष बाद नष्ट की जाने वाली वनस्पति का नाम कंडाली और किर्जी है। चौदास में इसे कंडाली और बूंदी में इसे किर्जी नाम से जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम आर्टिका डायोसिया है। यह भारत और नेपाल के उच्च मध्य हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती है। बूंदी में घटखोला और चौदास में सभी स्थानो पर पाई जाती है।

विजय का उल्लास है

स्थानीय परंपरा के अनुसार सदियों पूर्व उच्च हिमालयी क्षेत्र की एक महिला का 12वर्षीय पुत्र बीमार पड़ गया था। तब औषधि के रू प में वनस्पति का ही प्रयोग किया जाता था। किसी के द्वारा किर्जी से उपचार करने को कहा गया। किर्जी विषैली वनस्पति है। इसका प्रयोग करते ही महिला का पुत्र मर गया। 

तभी महिला ने इस वनस्पति को श्राप दिया कि बारहवें वर्ष में जब तेरी टहनियां भी बारह हो जाएंगी तब तुझे भी नष्ट कर दिया जाएगा। तब से धारचूला के व्यास और चौदास में प्रति बारह वर्ष बाद इसे नष्ट किया जाता है। चौदास में इसे कंडाली महोत्सव तो व्यास में किर्जी भामौ कहा जाता है। 

विषैली इस वनस्पति में प्रति वर्ष एक टहनी आती है और बारह वर्षो में बारह टहनियां आती हैं। बारह टहनियां आते ही परंपरा के अनुसार इसे स्थानीय लोग नष्ट कर देते हैं। जिसे किर्जी भामौ यानि विजयोत्सव माना जाता है।

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Posted By: Sunil Negi