कोटद्वार, अजय खंतवाल। पोलियो को जड़ से मिटाने के लिए वर्ष 1995 से देशव्यापी पल्स पोलियो प्रतिरक्षण अभियान चल रहा है। जागरुकता रैलियां निकाली जा रही हैं और घर-घर जाकर दो बूंद जिंदगी की पिलाई जा रही हैं। लेकिन, पौड़ी गढ़वाल जिले के अंतर्गत लैंसडौन वन प्रभाग के जंगलों में वन गुर्जर परिवारों के लगभग 250 ऐसे बच्चे भी हैं, जिनके परिवारों को यह तक मालूम नहीं कि पोलियो ड्रॉप क्या होती है।

यह दास्तान है कॉर्बेट व राजाजी टाइगर रिजर्व के मध्य स्थित लैंसडौन वन प्रभाग की कोटड़ी, दुगड्डा, कोटद्वार व लालढांग रेंज के जंगलों में निवास कर रहे वन गुर्जरों के उन परिवारों की, जिन्हें स्वास्थ्य महकमे ने पूरी तरह नियति के हवाले छोड़ा हुआ है। इन परिवारों के स्वास्थ्य की जांच के लिए आज तक कभी भी कोई स्वास्थ्य शिविर आयोजित नहीं किया गया। यही वजह है कि इन परिवारों की  महिलाएं विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हैं, बच्चों में थैलीसीमिया जैसी खतरनाक बीमारियां फैल रही हैं और बुजुर्गों की आंखें धोखा दे रही हैं। लेकिन, इसकी किसी को परवाह नहीं। हैरत तो इस बात की है कि पोलियो से मुक्त होने की ओर अग्रसर भारत में गुर्जर परिवारों के इन 250 बच्चों को आज तक पोलियो ड्रॉप तक नसीब नहीं हुई। इसका पता तब चला, जब गत 24 जून को लैंसडौन वन प्रभाग व हंस फाउंडेशन की ओर से कोटड़ी रेंज के अंतर्गत कोल्हूचौड़ वन विश्रामगृह परिसर में गुर्जर परिवारों के लिए निश्शुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया। इस दौरान जांच में दो बच्चे मानसिक रूप से कमजोर पाए गए, जबकि एक बच्चे में कैंसर के लक्षण मिले।

प्रभाग में हैं 125 परिवार और 525 की आबादी

लैंसडौन वन प्रभाग के जंगलों में रहने के लिए वन गुर्जरों को 75 परमिट जारी किए गए हैं। इनमें 37 परमिट प्रभाग की लालढांग रेंज, 24 परमिट कोटड़ी रेंज, आठ कोटद्वार रेंज और छह परमिट दुगड्डा रेंज के लिए जारी किए गए। कोटड़ी व दुगड्डा रेंज में स्थित डेरे मुख्य सड़क से करीब 11 किमी दूर स्थित हैं, जबकि कोटद्वार व लालढांग स्थित डेरों की दूरी मुख्य सड़क से पांच से दस किमी है। पूरे प्रभाग में वन गुर्जरों के 125 परिवार हैं, जिनकी आबादी 525 के आसपास है। इसमें पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या अधिक है। सभी डेरों में करीब 250 बच्चे हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं।

बीमार पड़ने पर जंगल की बूटी से चलाते हैं काम

सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा महकमे की ओर से वन गुर्जरों के डेरों में ही बच्चों की पढ़ाई करवाई जाती है। इसके लिए बाकायदा शिक्षक भी तैनात किए जाते हैं। कोटड़ी रेंज के वन गुर्जर छम्मा ने बताया कि जंगलों में बीते कई वर्षों से वन गुर्जरों का वास है, लेकिन स्वास्थ्य महकमे की ओर से आज तक उनका स्वास्थ्य परीक्षण नहीं कराया गया। बताया कि उन्हें और उनके बच्चों को पोलियो खुराक के बारे में न तो कोई जानकारी है और न कभी उन्होंने अपने पाल्यों को पोलियो खुराक पिलाई। बुखार सहित छोटी-मोटी बीमारियों में वे जंगल की बूटी से काम चला लेते हैं। बरसात में जब नदियां उफान पर होती हैं और रास्ते टूट जाते हैं, तब बीमार का भगवान ही मालिक है। 

'हंस' बना गुर्जर परिवारों का सहारा

24 जून को जब हंस फाउंडेशन की चिकित्सा टीम वन गुर्जरों के डेरे पर पहुंची तो वहां महिलाओं की स्थिति देख अचंभित रह गई। शिविर में पहुंचीं महिलाओं में से अधिकतर विभिन्न बीमारियों से पीडि़त मिलीं। जानकारी ली तो पता चला कि पुरुष दूध बांटने के बहाने जंगल से बाहर आ भी जाते हैं, लेकिन महिलाएं महीनों-महीनों तक जंगल में ही कैद रहती हैं। इस पर हंस फाउंडेशन के प्रांतीय प्रभारी पद्मेंद्र सिंह बिष्ट ने प्रत्येक माह के अंतिम सप्ताह में गुर्जरों के डेरे पर स्वास्थ्य शिविर लगाने का भरोसा दिलाया। साथ ही गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों का उपचार भी फाउंडेशन के माध्यम से करवाने की बात कही।

बोले अधिकारी

  • वैभव कुमार सिंह (प्रभागीय वनाधिकारी, लैंसडौन वन प्रभाग) का कहना है कि वन गुर्जरों के डेरों तक पोलियो टीम का न पहुंचना गंभीर विषय है। इस संबंध में जिलाधिकारी पौड़ी को पत्र भेज दिया गया है। यदि स्वास्थ्य महकमा पोलियो टीम की व्यवस्था करता है तो पोलियो दिवस के मौके पर विभागीय वाहन से पोलियो टीम को गुर्जरों के डेरों तक ले जाया जाएगा।
  • डॉ. बीएस जंगपांगी (मुख्य चिकित्सा अधिकारी, पौड़ी गढ़वाल) का कहना है कि वन गुर्जर परिवार जंगल में काफी भीतर रहते हैं, जहां स्वास्थ्य विभाग की टीम नहीं जा सकती। यदि वन महकमा डेरों तक पहुंचने की सुविधा मुहैया करवा दे तो टीम को डेरों में भेजकर पोलियो ड्रॉप पिलाई जा सकती है।

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Posted By: Sunil Negi