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हल्दूचौड़ हादसा: मैच से पहले मौत ने छीनी वॉलीबॉल खिलाड़ी प्रेरणा की जिंदगी, पिता की हालत गंभीर

Published: Fri, 02 Oct 2026 11:57 AM (IST)

हल्दूचौड़ में एक दर्दनाक सड़क हादसे में बेहतरीन वॉलीबॉल खिलाड़ी प्रेरणा की मौत हो गई। उसे अगले दिन मैच खेलना ...और पढ़ें

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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प्रकाश जोशी, लालकुआं। हल्दूचौड़ सड़क हादसे में जान गंवाने वाली प्रेरणा बेहतरीन वालीबाल खिलाड़ी थी। गुरुवार को वह पिता के साथ स्कूटी पर सवार होकर गौलापार खेल स्टेडियम में अंडर-19 मैच देखने पहुंची थी। उसका शुक्रवार यानी आज मैच होना था, लेकिन मैच से पहले ही मौत ने उसकी जिंदगी का खेल खत्म कर दिया।

प्रेरणा दोपहर 1:30 बजे स्कूटी से पापा के पीछे बैठकर गौलापार स्टेडियम से किच्छा को लौट रही थी। पीठ पर वालीबाल वाला बैग था और मन में उत्साह था कि शुक्रवार को जब मैच होगा तो अपनी पूरी प्रतिभा दिखाऊंगी। पिता भी हमेशा कहते थे बेटा, तू बस खेल पर ध्यान दे, बाकी दुनिया मैं संभाल लूंगा। गुरुवार को प्रेरणा खेली नहीं, सिर्फ मैच देखने गई थी।

मैच देखने गई थी प्रेरणा 

देखना भी सीखना होता है अक्सर पापा यही कहते थे। लौटते वक्त वह बहुत बोल रही थी। पापा, अगली बार मैं नेट पर ऐसे जाऊंगी, ऐसे खेलूंगी... हल्दूचौड़ चौकी से थोड़ा आगे, गायत्री शक्तिपीठ के पास, सड़क वही थी, दोपहर वही थी। पीछे से काल बनकर डंपर आया, उसे जल्दी थी। एक जोर की आवाज हुई और दो सपने टूटकर सड़क पर बिखर गए। बेटी ने पापा का हाथ पकड़ा हुआ था। फिर हाथ छूट गया।

अस्पताल की सफेद चादर पर पापा लेटे हैं। पैर और सीने में दर्द है पर आंखें बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही हैं। उन्हें लग रहा है अभी प्रेरणा आएगी, कहेगी पापा चलो, प्रैक्टिस लेट हो रही है। स्कूटी सड़क पर पड़ी है, बैग में वालीबाल वैसी ही रखी है, हवा भरी हुई। पर उसे उछालने वाले हाथ अब नहीं हैं।

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पापा ने बेटी को खिलाड़ी बनाने के लिए मैदान दिखाया था पर सड़क हादसे ने उसे छीन लिया। एक डंपर, एक ब्रेक जो नहीं लगा और एक पिता जो अब जिंदगी भर एक अधूरी कहानी लेकर जिएगा कि वह अपनी बेटी को घर तक नहीं पहुंचा सका। मैदान आज भी है, नेट आज भी लगा है। बस वो छोटी सी बालिका जो कल तक उस मैदान का सपना थी, आज उसी मैदान की सबसे खामोश याद बन गई है।

श्री कृष्ण मर्चेंट एसोसिएशन इंटर कालेज की थी छात्रा

14 वर्षीय प्रेरणा श्री कृष्ण मर्चेंट एसोसिएशन इंटर कालेज किच्छा में कक्षा नौ की छात्रा थी। उसका चयन गौलापार में चल रही सांसद स्तरीय खेल प्रतियोगिता के लिए हुआ था। प्रतियोगिता की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए वह लगातार मेहनत कर रही थी। गुरुवार को अंडर-19 वर्ग का मुकाबला था।

पिता सुरेंद्र कुमार बेटी को मैच दिखाने स्टेडियम ले गए थे। मकसद सिर्फ इतना था कि प्रेरणा अपने से बड़े खिलाड़ियों का खेल देखे, उनसे कुछ सीखे और अगले दिन मैदान में और बेहतर प्रदर्शन कर सके। स्टेडियम में शायद वह आने वाले मुकाबले को लेकर उत्साहित रही होगी। उसे क्या पता था कि यह सफर उसके जीवन का आखिरी सफर बन जाएगा।

कई मेडल जीत चुकी थी प्रेरणा

प्रेरणा वालीबाल की मेधावी खिलाड़ी थी। वह खेल महाकुंभ समेत विभिन्न प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुकी थी। इस बार भी उसने सांसद स्तरीय प्रतियोगिता के लिए काफी मेहनत की थी। परिवार को उम्मीद थी कि बेटी खेल के क्षेत्र में आगे बढ़कर नाम रोशन करेगी। पिता भी उसकी इस यात्रा में हर कदम पर साथ खड़े थे।

दो बहनों में बड़ी थी प्रेरणा

प्रेरणा दो बहनों में बड़ी थी। छोटी बहन किच्छा के नालंदा स्कूल में पढ़ती है। बहन की मौत के बाद मां ममता और छोटी बहन का रो-रोकर बुरा हाल है। घर में जिस बेटी की आवाज और हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सिसकियां सुनाई दे रही हैं।

हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की प्रेरणा आसपास के लोगों और अपनी सहेलियों की भी लाडली थी। उसकी असमय मौत से क्षेत्र में शोक की लहर है। परिवार ने जिस बेटी को आने वाले दिनों में मेडल जीतते, मैदान में चमकते और जिंदगी में आगे बढ़ते देखने के सपने संजोए थे, वे सपने एक झटके में बिखर गए।

बार-बार बेटी का हाल पूछ रहे सुरेंद्र

एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है कि उसकी आंखों के सामने उसकी बेटी दम तोड़ दे और वह चाहकर भी उसे बचा न सके। गुरुवार को हादसे के बाद सुरेंद्र कुमार और उनकी बेटी प्रेरणा स्कूटी से सड़क पर जा गिरे। दोनों के शरीर से खून बह रहा था।

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पैर में फ्रैक्चर और शरीर पर आई गंभीर चोटों के कारण सुरेंद्र भी अर्धमूर्छित अवस्था में थे। कुछ देर बाद जब बेटी की ममता ने उन्हें जैसे जगाया तो सुरेंद्र ने आंखें खोलीं। सामने बेटी को बेजान पड़ा देखा तो उनकी आंखें डबडबा गईं। दर्द से कराहते हुए उन्होंने जेब से मोबाइल निकाला और मदद के लिए फोन किया।

सड़क पर घायल पड़े पिता और बेजान बेटी का यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। अस्पताल में भी काफी देर तक सुरेंद्र बार-बार बेटी की हालत के बारे में पूछते रहे। खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्हें अपनी चिंता से ज्यादा बेटी की फिक्र थी।