जागरण संवाददाता, पिथौरागढ़ : शीतकाल में उच्च हिमालय में कम बर्फबारी का आभास माइग्रेशन करने वाले पक्षी दे रहे हैं। हर साल भारी संख्या में उच्च हिमालय से मध्य हिमालय में माइग्रेशन करने वाले पक्षी स्नो पार्टीज और स्नो कॉक इस बार काफी कम संख्या में खलिया टाॅप तक आए। उनके मात्र दो झुंड ही खलिया में नजर आए। झुंडों में संख्या दहाई तक नहीं है।

 

इस वर्ष शीतकाल एक तरह से सूखा ही रहा। पूरे सीजन में मुनस्यारी में तक हिमपात नहीं के बराबर हुआ। मई तक लकदक रहने वाले खलिया टॉप में मई में जाकर हिमपात हुआ। उच्च हिमालय में भी काफी कम बर्फबारी का संकेत शीतकाल में माइग्रेशन करने वाले पक्षी दे रहे हैं। उच्च हिमालय में 13 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर निवास करने वाले स्नो पार्टीज और स्नो कॉक उच्च हिमालय में बर्फबारी का संकेत देते हैं। अधिक हिमपात होने पर शीतकाल में ये दोनों पक्षी तीन हजार मीटर तक की ऊंचाई तक झुंडों में आते हैं।

 

इस वर्ष पक्षी प्रेमी इस बात से हैरान हैं कि पूरा शीतकाल बीत गया और स्नो पार्टीज और स्नो कॉक के उच्च हिमालय वापस लौटने का समय हो गया लेकिन उनके खलिया क्षेत्र में जीरो प्वाइंट और रुड़खान में केवल दो झुंड दिखे हैं। पक्षी प्रेमी एवं वर्ड वॉचिंग से जुड़े मोनाल संस्था के सचिव सुरेंद्र पवार बताते हैं कि खलिया के इस क्षेत्र में स्नो पार्टीज का एक झुुंड नजर आया जिसमें मात्र नौ पक्षी शामिल थे और स्नो कॉक का भी एक ही झुंड दिखा, जिसमें केवल छह पक्षी थे।

 

पवार बताते हैं कि जब उच्च हिमालय में भारी हिमपात होता है तो उस वर्ष दोनों पक्षियों के झुंड मध्य हिमालय में खलिया क्षेत्र में बहुतायत में नजर आते हैं। उनके झुंडों में पक्षियों की संख्या भी काफी अधिक रहती है। स्नो पार्टीज और स्नो कॉक नामिक ग्लेशियर और मिलम क्षेत्र में बुगडियार से आगे पाए जाते हैं। ये पक्षी ब्रीडिंग भी उच्च हिमालय में ही करते हैं। प्रतिवर्ष मई माह तक मध्य हिमालय में रहने के बाद फिर अपने मूल स्थान को जाते हैं।

 

उच्च हिमालय में भोजन मिलने से नहीं उतरते हैं मध्य हिमालय को

स्नो पार्टीज और स्नो कॉक मध्य हिमालय में तीन हजार मीटर तक ही आते हैंं । शीतकाल में उच्च हिमालय में भारी हिमपात के चलते जब कई फीट बर्फ जम जाती है तो भोजन के लिए ये नीचे उतरते हैं। जमीन से कीड़े, मकोड़े खाने वाले स्नो पार्टीज और स्नो कॉक को इस वर्ष उच्च हिमालय में ही भोजन मिलता रहा। पक्षियों के जानकार बताते हैं कि इन दोनों पक्षियों के मध्य हिमालय में काफी कम संख्या में आने का अर्थ उच्च हिमालय में कम बर्फबारी का संकेत है।

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