उत्तराखंड के पहाड़ बन रहे गुलदारों का अड्डा, बदलते मौसम और खाली होते गांवों में हमला करना हुआ आसान
उत्तराखंड में गुलदारों के हमलों में वृद्धि हुई है, जिससे इस साल 18 लोगों की मौत हो चुकी है। बदलते ...और पढ़ें

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
गुलदार हमलों में इस साल 18, कुल 567 लोगों की मौत।
मौसम बदलाव, खाली गांव गुलदार संख्या वृद्धि के प्रमुख कारण।
बाघों ने गुलदारों को पहाड़ों की ओर धकेला, बढ़ा संघर्ष।
ललित मोहन बेलवाल, हल्द्वानी। उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष में सबसे बड़ी भूमिका गुलदार की है। इसी साल गुलदार के हमलों में 18 लोगों की मौत हो चुकी है। गुलदार आए दिन इंसानों से लेकर मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह मौसम में बदलाव और खाली होते गांवों के चलते उनके लिए बना अनुकूल माहौल है।
प्रदेश में गुलदार की अंतिम गणना 2022 में हुई थी, जिसमें उनकी संख्या 3115 थी। इस वर्ष फिर से उनकी गणना होनी है। हालांकि विशेषज्ञ अभी से मान रहे हैं कि प्रदेश में गुलदार की संख्या बेहद तेजी से वृद्धि हुई है।
यही वजह है कि वे अब घर, आंगन और गोशाला में पहुंच रहे हैं। इन्हीं अभूतपुर्व अनुकूल माहौल के चलते गुलदार प्रदेश में सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। इसकी पुष्टि वन विभाग के आंकड़े भी करते हैं। वर्ष 2000 से अब तक 567 लोग गुलदार के हमलों में अपनी जान गंवा चुके हैं, जो इस अवधि में वन्यजीवों से होने वाली मौतों का लगभग 44 प्रतिशत है।
मौसम चक्र में बदलाव से बढ़ा सर्वाइवल रेट
वन्यजीव विशेषज्ञ एजी अंसारी बताते हैं कि मादा गुलदार एक बार में तीन से चार शावकों को जन्म देती है। ठंडे मौसम की मार और शिकारी जानवरों के हमलों के चलते गुलदार के बच्चों को सर्वाइवल रेट 40 से 50 प्रतिशत रहता है। लेकिन, मौसमी बदलाव के चलते गर्मी बढ़ गई है। इस कारण लगभग एक दशक में यह देखने को मिला है कि कई मामलों में सर्वाइवल रेट 100 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे भी उनकी संख्या बढ़ रही है।
कानूनी संरक्षण ने भी बढ़ाई संख्या
गुलदार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत शेड्यूल-1 श्रेणी का जानवर है। इसे सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त है। इस वजह से भी गुलदार की संख्या तो बढ़ गई है, लेकिन अब उसकी बढ़ती संख्या को संतुलित करने के लिए कोई प्लान बी नहीं है।
घरों के पास पहुंच गए जंगल
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रदेश में खाली होते गांवों के चलते आंगनों में ऊंची-ऊंची झाड़ियां उग आई हैं, जो गुलदार के रहने के लिए मुफीद जगह है। झाड़ी की शक्ल में घरों के पास जंगल पहुंच गए हैं। इसी तरह पहाड़ों में पशुपालन बेहद कम हो गया है।
पूर्व में गुलदार घरों के पास आते भी थे तो वे मवेशी और पालतू जानवरों पर हमला करते थे, लेकिन अब मवेशी कम हो गए हैं, जिससे वन्यजीव और मानव के बीच का बफर खत्म हो गया है।
बाघों ने पहाड़ों की ओर खदेड़े गुलदार
कार्बेट से लेकर राजाजी टाइगर रिजर्व तक में प्रोजेक्ट टाइगर के बाद बाघों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। चूंकि गुलदार को बाघों से सीधा खतरा होता है इसलिए वे टाइगर रिजर्व छोड़ रहे हैं। पहाड़ों में गुलदार की बढ़ती संख्या की एक वजह यह भी मानी जाती है। इस पर पहाड़ों में बाघ और शेर होते नहीं हैं, इसलिए यह वहां अपेक्स प्रीडेटर (शीर्ष शिकारी) बन जाता है, जहां उसे सीधा खतरा किसी से नहीं है।
पहाड़ों में घटते सियार से खाद्य शृंखला प्रभावित
अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि पहाड़ों से पलायन के चलते सियारों की संख्या भी कम हुई है। चूंकि पहाड़ों में गुलदार के बच्चों के लिए एक खतरा सियार होते थे वो भी बहुत कम हो गए हैं, जिससे गुलदार की संख्या संतुलित रखने वाली खाद्य शृंखला भी प्रभावित हो रही है। हालांकि इसे लेकर वन्यजीव विशेषज्ञ एससी उपाध्याय का कहना है कि अभी यह मानना जल्दबाजी होगा। यह शोध का विषय है।
गुलदार की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह उनके लिए पहाड़ों में बने अनुकूल माहौल हैं। इनकी संख्या संतुलित करने के लिए अब प्लान बी पर काम करना होगा। साथ ही घरों के आसपास उगी झाड़ियों को काटने के काम को वीबी जीरामजी योजना में जोड़ना चाहिए, ताकि इसके माध्यम से आबादी के करीब उनके वासस्थल को खत्म किया जा सके। -एजी अंसारी, वन्यजीव विशेषज्ञ।
