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उत्तराखंड के दो सपूतों को 29 और 32 साल बाद मिला बलिदानी होने का सर्टिफिकेट, सम्मान पाकर स्वजनों की छलकीं आंखें

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Wed, 28 Oct 2026 06:22 AM (IST)

उत्तराखंड के दो सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों, नायक ध्यान सिंह और मुख्य आरक्षक हीरा बल्लभ जोशी को उनके ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. बीएसएफ के दो बलिदानी जवानों को मिला सम्मान प्रमाणपत्र।

  2. नायक ध्यान सिंह को 29 साल बाद मिली आधिकारिक पहचान।

  3. हीरा बल्लभ जोशी के परिवार को 32 साल बाद सम्मान मिला।

जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। सीमाओं की रक्षा करते हुए जांबाजों ने देश के लिए प्राणों की आहुति दी लेकिन बलिदानी होने का दर्जा न मिलना उनके स्वजन को भी टीस दे रहा था। वर्षों की कवायद के बाद सीमा सुरक्षा बल(बीएसएफ) महानिदेशालय नई दिल्ली ने कुमाऊं के दो वीरों को उनका सम्मान दिलाया है। बल के अधिकारियों ने घर आकर आपरेशनल कैजुअल्टी प्रमाणपत्र सौंपा तो स्वजन की आंखें छलक पड़ीं।

उत्तराखंड में पिथौरागढ़ जिले की तहसील डीडीहाट के हाट थर्प निवासी सीमा सुरक्षा बल के नायक ध्यान सिंह के बलिदान को 29 साल बाद आधिकारिक पहचान मिली है। सीमा सुरक्षा बल के मुख्य आरक्षक हीरा बल्लभ जोशी के परिवार को भी 32 साल बाद बलिदान प्रमाणपत्र मिला है।

नायक (सामान्य ड्यूटी) ध्यान सिंह सात मार्च 1981 को बीएसएफ में भर्ती हुए थे। उन्होंने नौ अक्टूबर 1996 को 135-बटालियन के साथ भारत-पाक वास्तविक नियंत्रण रेखा, एफडीएल हाथी, बांदीपुर (जम्मू-कश्मीर) में तैनाती के दौरान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। बल की 94वीं बटालियन के उप कमांडेंट योगेश कुमार ने हल्द्वानी स्थित आवास पर बल्लभ जाशी की पत्नी पार्वती जोशी को प्रमाणपत्र दिया।

इसे पाकर वह भावुक हो गईं। दरअसल, अल्मोड़ा जिले के ग्राम मेहला, पोस्ट भगतोला निवासी हीरा बल्लभ जोशी 23 अप्रैल 1969 को बीएसएफ में भर्ती हुए थे। 13 सितंबर 1994 को कश्मीर घाटी के अनंतनाग क्षेत्र में तलाशी अभियान के दौरान आतंकियों से मुठभेड़ में वह बलिदान हो गए थे।