हल्द्वानी, जेएनएन : स्वच्छ भारत मिशन ने स्वच्छता को लेकर सामाजिक चेतना फैलाने का काम किया है। विभिन्न माध्यमों से हुए प्रचार-प्रसार ने लोगों में स्वच्छता की संस्कृति विकसित करने जैसा काम किया। इसी का नतीजा रहा कि स्वच्छ भारत मिशन, मनरेगा व स्वजल परियोजना के माध्यम से घर-घर में शौचालय बन चुके हैं या बन रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में पूरा प्रदेश ही ओडीएफ घोषित है। बावजूद इसके स्थिति यह है कि परिवारों में विघटन, योजनाओं के लिए बजट की अनुपलब्धता एवं झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वालों के पास भूमि का अभाव तमाम ऐसे कारण है जो अभियान का उद्देश्य पूरा करने में बाधक भी हैं।

अल्मोड़ा में बनने हैं 4762 परिवारों के लिए शौचालय

डीआरडीए के परियोजना निदेशक नरेश कुमार के मुताबिक अल्मोड़ा जिला ओडीए हो चुका है। 4762 परिवारों के और शौचालय बनने हैं जो निर्माणाधीन हैं। इस वित्तीय वर्ष में पूरे कर लिए जाएंगे। ये वह परिवार हैं जो उस सर्वे के दायरे में नहीं आए या सर्वे के बाद विभाजित हुए। वर्ष 2012 की सर्वे के अनुसार 54000 शौचालय बनाए जाने थे। जो पूरे कर लिए गए हैं।

नैनीताल जिला ओडीएफ, झुग्गी-झोपड़ी वालों को पक्की छत भी नहीं

नैनीताल जिले में करीब 30 हजार घरों में शौचालय का निर्माण हो सका है। आवेदन के आधार पर नए शौचालयों का निर्माण भी हो रहा है। दूसरी ओर जिले के सबसे बड़े नगर हल्द्वानी में करीब पांच से अधिक की आबादी झुग्गी-झोपड़ी में निवास करती है। ऐसे परिवार जिनके पास जाड़ा, गर्मी व बरसात में सिर छुपाने के लिए छत तक नहीं है, उनके लिए शौचालय अभी सपना ही है। हालांकि सरकारी आंकड़ों में जिला खुले में शौच मुक्त घोषित हो चुका है।

पिथौरागढ़ जिला ओडीएफ घोषित फिर भी 6000 परिवार इंतजार में 

स्वच्छ भारत अभियान के तहत पिथौरागढ़ जिले को खुले में शौच मुक्त 2016 में ही घोषित कर दिया गया था। जिला विकास अधिकारी गोपाल गिरी गोस्वामी के मुताबिक ओडीएफ घोषित होने के बाद तमाम परिवार पृथक हो गए, इसलिए 6000 आवेदक बढ़ गए। नए आवेदकों को नए वित्तीय वर्ष में बजट मुहैया कराकर शौचालय बना दिए जाएंगे।

कुमाऊं में पब्लिक शौचालय की अभी और दरकार

घर-घर शौचालय बनने से लोगों ने राहत महसूस की हो, लेकिन पर्यटन के मुख्य केंद्र हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, कौसानी, पिथौरागढ़ व चम्पावत मुख्य शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की कमी है। बाजारों में पब्लिक की जरूरत के मुताबिक  शौचालय स्थानीय निकाय या निगम नहीं बना सके हैं। इसमें कहीं जगह का अभाव है तो कहीं तंत्र की हीलाहवाली।

पानी की कमी बन रहा बाधा

पर्वतीय अंचल से लेकर भाबर के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में पेयजल की काफी कमी है। ऐसे में शौचालय बनने के बाद भी ग्रामीण शौचालय का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे।

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Posted By: Skand Shukla

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