भीमताल, [जेएनएन]: सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाई कोर्ट के नेशनल इन्वारमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट नीरी की अनुमति के बिना झील के दो किमी एरियल दायरे में निर्माण पर प्रतिबंध लगाने संबंधी आदेश पर स्थगनादेश दे दिया है। सर्वोच्च अदालत ने उत्तराखंड सरकार, याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 

भीमताल के रीगन गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानवेलकर व न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने मामले में स्थगनादेश देते हुए विपक्षियों को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश पारित किया है। ग्लेशियरों के दायरे में प्लास्टिक उपयोग पर भी लगाई थी पाबंदी 

हाई कोर्ट ने तारा चंद्र राजपूत की जनहित याचिका पर आदेश पारित करते हुए उत्तराखंड के हिल स्टेशन के पांच किमी दायरे में पेड़ कटान, छपान, ग्लेशियर के दस किमी दायरे में लकड़ी काटने, जलाने तथा ग्लेशियर के 20 किमी दायरे में प्लास्टिक बोतल, बैग ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से हिल स्टेशन व ग्लेशियर को ईको-सेंसेटिव जोन घोषित करने व इसका उल्लंघन करने वालों पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के तहत कार्रवाई करने का आदेश पारित किया था।

हाई कोर्ट के आदेश से  नैनीताल के साथ ही भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, खुर्पाताल मेें निर्माण पर पाबंदी लग गई, साथ ही भवाली बाइपास, नैनीताल में बीडी पांडे नर्सिंग कॉलेज भवन जैसे जनहित के काम भी अधर में लटक गए। सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि हाई कोर्ट में दायर याचिका एक व्यक्ति के खिलाफ थी। याचिका का दायरा बढ़ाने से पहले प्रभावित पक्षकारों को न पक्षकार बनाया गया और न ही उन्हें सुनवाई का मौका दिया गया। 

पर्दे के पीछे रही सरकार 

सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी की पैरवी के लिए उत्तराखंड सरकार ने पर्दे के पीछे रहकर भूमिका अदा की। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को तमाम तथ्य मुहैया कराए गए। 

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Posted By: Raksha Panthari

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