जागरण संवाददाता, नैनीताल : कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. डीके नौडि़याल का कहना है कि लोक जीवन में परंपराएं अविरल प्रवाह के रूप में बहती हैं, जो समाज अपनी संस्कृति और और परंपरा से जितना गहराई से जुड़ा होगा, वही समाज उतना अधिक संस्कारित होगा। कुलपति के अनुसार लोक साहित्य एवं लोक परंपराएं भारतीयता से जुड़ा मुद्दा है।

कुलपति मंगलवार को हरमिटेज भवन में कवियित्री महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर 'लोकनाट्य : परंपरा और विकास' विषयक तीन दिनी संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश मानस ने कहा कि लोक साहित्य की विधाओं में नाटक सशक्त माध्यम है। इसके जरिए समाज में दिए जा रहे संदेश का प्रभाव दूरगामी होता है। त्रिवेंद्रम, केरल से पहुंचे नाट्य विशेषज्ञ बी. अशोक ने कहा कि लोकनाट्य से तात्पर्य नाटक के उस रूप से है, जिसका संबंध सर्वधारण के जीवन से हो। कहा कि वैदिक युग के पश्चात रामायण-महाभारत महाकाव्य ने लोक नाट्यों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमाऊं विवि की ¨हदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन ने कहा कि भारत की संस्कृति को जितना प्राचीन मानते हैं, लोक नाट्य अलिखित होने से हम तक नहीं पहुंच पाए, मगर इसके प्रमाण दो हजार साल से अधिक पहले के मिलते हैं।

महादेवी सृजन पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि उत्तराखंड में रामलीला, भड़ौ, हिलजात्रा, स्वांग, जागर वार्ता आदि में लोक नाट्य की स्वस्थ परंपरा मिलती है। संगोष्ठी में डॉ. त्रिभुवन गिरी, डॉ. लक्ष्मी धस्माना, प्रो. मानवेंद्र पाठक, राजेश प्रसाद, प्रो. बीएल साह, प्रो. नीता बोरा शर्मा, प्रो. गंगा बिष्ट, प्रो. चंद्रकला रावत, भाष्कर दत्त कापड़ी, डॉ. हरिसुमन बिष्ट, प्रो. निर्मला ढैला बोरा, प्रो. सावित्री कैंडा जंतवाल, डॉ. शुभा मटियानी, डॉ. दिवा भट्ट समेत जहूर आलम आदि मौजूद थे। संचालन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया।

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