नैनीताल, नरेश कुमार : एक सप्ताह से नैनीताल और समीपवर्ती क्षेत्रों में लगी आग न सिर्फ वन संपदा, जंगली जीवों को प्रभावित कर रही है, बल्कि इससे उत्सर्जित गैस और कार्बन पार्टिकल हवाओं में जहर घोल रहे हैं। महज एक सप्ताह में ही वनाग्नि के कारण जानलेवा माने जाने वाले ब्लैक कार्बन की मात्रा में सामान्य दिनों से 16 गुना तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हानिकारक पीएम 2.5 के स्तर में भी बढ़ोतरी हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि समय रहते यदि वनों की आग पर काबू नहीं पाया गया तो कोविड के दौरान यह लोगों की सेहत के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। 

15 फरवरी से 15 जून तक माना जाने वाला फायर सीजन जंगलों में आग लगने के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है। करीब 71 फीसदी वन भूभाग वाले उत्तराखंड में चीड़ के पेड़ों की अधिकता होने के कारण आग लगने की आशंकाएं और अधिक प्रबल हो जाती हैं। इस वर्ष एक सप्ताह से शहर के समीपवर्ती क्षेत्रों के जंगल धधक रहे हैं, जिसकी रोकथाम वन विभाग के लिए भी चुनौती बना हुआ है। 

आग के कारण बेशकीमती वन संपदा, वन्यजीवों को क्षति तो पहुंच ही रही है, यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी घातक साबित हो रही है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान के पर्यावरण विशेषज्ञ डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि आग लगने के बाद ब्लैक कार्बन, पीएम 2.5 जैसे कार्बन पार्टिकल और कार्बन मोनो आक्साइड जैसे प्रदूषकों की मात्रा वायुमंडल में कई गुना बढ़ गई है। यह मानव स्वास्थ्य के साथ ही हिमालय क्षेत्र और ग्लेशियरों के लिए भी घातक हो सकता है। 

तापमान बढ़ाता है ब्लैक कार्बन

डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि सामान्य दिनों में वायुमंडल में ब्लैक कार्बन की मात्रा एक माइक्रोग्राम प्रति क्यूब मीटर होती है, जो बढ़कर 16 माइक्रोग्राम प्रति क्यूब मीटर पहुंच गई है। ब्लैक कार्बन जीवाश्म ईधन या लकड़ी के अपूर्ण दहन पर उत्सर्जित होने वाला कणीय पदार्थ है। यह उत्सर्जन के बाद एक से दो सप्ताह तक वायुमंडल में स्थिर रह सकता है। इससे तापमान में बढ़ोतरी होती है, जिस कारण यह ग्लेशियरों के पिघलने का भी सबसे बड़ा कारण बन रहा है। 

85 माइक्रोग्राम पहुंची पीएम 2.5 की मात्रा

मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक माना जाने वाले पोल्यूटेड मैटर पीएम 2.5 की मात्रा में भी वनाग्नि के बाद कई गुना बढ़ोतरी हुई है। डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि सामान्य दिनों में नैनीताल में इसकी मात्रा 25-30 माइक्रोग्राम क्यूब मीटर होती है, जो आग लगने के बाद अब 85 पहुंच गई है। बताया कि आग लगने के बाद धूल के बहुत छोटे कण हवा में घुल जाते है। जोकि सांस के जरिये आसानी से फेफड़ो तक पहुंच जाते है। इसकी अधिकता से व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर तक हो जाता है। 

कोविड काल में और खतरनाक है वायु प्रदूषण

वरिष्ठ फिजीशियन डा. एमएस दुग्ताल ने बताया कि कोविड से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला अंग फेफड़ा है। ऐसे में हवा में कार्बन और अन्य गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी होने पर कोविड और अधिक तेजी से लोगों को प्रभावित करेगा। ऐसे में लोगों को और अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है।

Uttarakhand Flood Disaster: चमोली हादसे से संबंधित सभी सामग्री पढ़ने के लिए क्लिक करें