हल्द्वानी, जेएनएन : आश्विन माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी व्रत और पूजा करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। श्रीमद भगवतगीता के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी के बारे में बताया था। इस बार ये एकादशी व्रत 27 अक्टूबर को है।

व्रत की विधि

इस्कान से जुड़े जगदीश दास बताते हैं कि इस व्रत का पालन दशमी तिथि से ही करना चाहिए। दशमी तिथि पर सात तरह के अनाज गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। एकादशी तिथि पर सुबह उठकर नहाने के बाद व्रत का संकल्प लें। श्रद्धा के मुताबिक एक समय फलाहार या फिर बिना भोजन का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद घट स्थापना की जाती है। भगवान विष्णु की मूर्ति रखकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। व्रत का पारायण द्वादशी तिथि (28 अक्टूबर) की सुबह ब्राह्मणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद करना चाहिए। व्रत के पारायण के लिए सुबह साढे छह से 10ः13 बजे तक का श्रेष्ठ मुहूर्त है।

एकादशी का माहात्म्य 

इस्कान के जगदीश दास बताते हैं कि श्रीमद भगवत गीता के अनुसार युधिष्ठिर ने पूछा हे मधुसूदन! अब आप कृपा करके यह बताइये कि आश्विन के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका माहात्म्य क्या है? भगवान श्रीकृष्ण बोले राजन! आश्विन के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पापांकुशा’ नाम से विख्यात है। वह सब पापों को हरनेवाली, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली, शरीर को निरोग बनाने वाली तथा धन व मित्र देनेवाली है। यदि अन्य कार्य के प्रसंग से भी मनुष्य इस एकमात्र एकादशी को उपास कर ले तो उसे कभी यम यातना नहीं प्राप्त होती। एकादशी के दिन उपवास और रात्रि में जागरण करने वाले मनुष्य अनायास ही दिव्यरुपधारी, चतुर्भुज, गरुड़ की ध्वजा से युक्त, हार से सुशोभित और पीताम्बरधारी होकर भगवान विष्णु के धाम को जाते हैं। ऐसे पुरुष मातृपक्ष की दस, पितृपक्ष की दस तथा पत्नी के पक्ष की भी दस पीढ़ियों का उद्धार कर देते हैं। उस दिन सम्पूर्ण मनोरथ की प्राप्ति के लिए मुझ वासुदेव का पूजन करना चाहिए। जितेन्द्रिय मुनि चिरकाल तक कठोर तपस्या करके जिस फल को प्राप्त करता है, वह फल उस दिन भगवान गरुड़ध्वज को प्रणाम करने से ही मिल जाता है। जो पुरुष स्वर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते और छाते का दान करता है, वह कभी यमराज को नहीं देखता। जो होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ आदि पुण्यकर्म करने वाले हैं, उन्हें भयंकर यम यातना नहीं देखनी पड़ती। लोक में जो मानव दीर्घायु, धनाढय, कुलीन और निरोग देखे जाते हैं, वे पहले के पुण्यात्मा हैं। पुण्यकर्ता पुरुष ऐसे ही देखे जाते है। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, मनुष्य पाप से दुर्गति में पड़ते हैं और धर्म से स्वर्ग में जाते है।

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