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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 15, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

उत्तराखंड में चलेगी राष्ट्रीय सामाजिक कार्य शिक्षा परिषद की मुहिम

By Skand ShuklaEdited By:
Published: Thu, 15 Jul 2021 01:29 PM (IST)

राष्ट्रीय सामाजिक कार्य शिक्षा परिषद (एनएपीएडब्ल्यूआइ) की मुहिम अब उत्तराखंड में भी चलेगी। इसका उद्देश्य है समाज कार्य विषयों को ...और पढ़ें

उत्तराखंड में चलेगी राष्ट्रीय सामाजिक कार्य शिक्षा परिषद की मुहिम
उत्तराखंड में चलेगी राष्ट्रीय सामाजिक कार्य शिक्षा परिषद की मुहिम

जागरण संवाददाता, हल्द्वानी : राष्ट्रीय सामाजिक कार्य शिक्षा परिषद (एनएपीएडब्ल्यूआइ) की मुहिम अब उत्तराखंड में भी चलेगी। इसका उद्देश्य है, समाज कार्य विषयों को नई पहचान दिलाना। इसके लिए प्रदेश स्तर पर समन्वयक व सलाहकार मंडल तय कर दिए हैं। जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर वेबिनार का आयोजन होगा।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी में समाज कार्य विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. नीरजा सिंह को परिषद में राज्य समन्वयक की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने बताया कि परिषद का उद्देश्य देश भर में सामाजिक कार्य विषय की गुणवत्ता बढ़ाने, ज्ञान और नैतिक आचरण और मान्यता प्राप्त सामाजिक कार्य का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाना है। यह विषय सामाजिक न्याय और सामाजिक विकास को बढ़ावा देता है। इसके साथ ही परिषद का मकसद समाज कार्य के विद्यार्थियों को उनकी पहचान दिलाना, उन्हें उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलशिप दिलाने और नौकरियों में प्राथमिकता दिलाना है।

ये रहेंगे शामिल

सलाहकार के रूप में हिमालयीय विश्वविद्यालय देहरादून के कुलपति प्रो. जेपी पचौरी, राज्य सह समन्वयक त्रिकोण सोसाइटी के चेयरपर्सन डा. नेहा शर्मा, राज्य समन्वयक दून विश्वविद्यालय देहरादून के सहायक प्रोफेसर डा. नरेश मिश्र, राज्य सहायक समन्वयक, यूएसएसीएसआई देहरादून के संजय बिष्ट व ट्रस्टी आन चैरिटेबल ट्रस्ट काशीपुर की नमिता गुप्ता शामिल हैं।

राज्य के लिए प्रासंगिक है विषय

डा. नीरजा बताती हैं, सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका उत्तराखंड के लिए और अधिक प्रासंगिक है। परिषद के निर्माण के बाद प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता अपने हक एवं पहचान के साथ इस क्षेत्र में कार्य कर सकेंगे। डा. नीरजा बताती हैं, उत्तराखंड देश के उत्तरी राज्यो में एक ऐसा राज्य है, जहां जनजीवन कठिन है। विस्थापन की समस्या है। इसके चलते बुजुर्गों का अकेलापन है। दूसरी ओर यहां के परिवारों के अधिकांश पुरुष सेना में हैं। उनकी महिलाओं को अकेला रहना पड़ता है। ऐसे में इन परिवारों को मानसिक संबल की जरूरत होती है। राज्य में समाज कार्य की शिक्षा दी जा रही है। इसका क्षेत्र भी व्यापक होता जा रहा है।