नालों से आ रहे कचरे-गाद, सीवर की गंदगी ने बिगाड़ी नैनीताल झील की सेहत... घट रही गहराई
नैनीताल झील मानवीय लापरवाही, अवैध निर्माण और बढ़ते जनदबाव के कारण गंभीर संकट में है, जिससे इसकी गहराई घट रही है और पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा है।


समय कम है?
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किशोर जोशी, नैनीताल। देश दुनिया में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल की झील की सरकारी उपेक्षा, वैध-अवैध निर्माण, मानवीय लापरवाही व बढ़ते जनदबाव की वजह से सांसें उखड़ रही हैं। यहां तक कि मानसून या ऑफ सीजन की बारिश में मलबा, कूड़ा करकट झील में समा रहा है तो गाद से झील की गहराई घट रही है।
पिछले एक दशक में झील से गाद बेहद कम निकाली गई, इस बार तो सिंचाई विभाग ने केवल खानापूर्ति की। इसके अलावा नालों से झील में जा रही सीवर की गंदगी से झील का पारिस्थितिक तंत्र भी बिगड़ रहा है। ऐसे में झील को लेकर तंत्र की उपेक्षा अस्तित्व का सवाल गहरा कर रही है। शहर की 2006 में भार वहन क्षमता समाप्त होने के बाद नए सिरे से झील व शहर के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास नहीं हो रहे हैं।
नैनीताल शहर की आबादी 1881 में जहां 7589 थी तो वर्तमान यह 60 हजार पार कर गई है जबकि पर्यटन सीजन में रोजाना डेढ़ लाख तक पर्यटकों का दबाव होता है। 60 के दशक में पर्यटन बढ़ने के बाद 1964 में यहां 2.75 लाख पर्यटक आए जबकि 2014 में यह संख्या 7.5 लाख से अधिक पहुंच गई है। 2025 में यह संख्या दस लाख पार कर चुकी है। शहर की सीवर लाइन बूढ़ी हो चुकी है।
इन्सेट
वैध-अवैध निर्माण व नालों से कूड़ा-कचरा बना झील के लिए अभिशाप
नैनीताल: 2024 में जिला प्रशासन की ओर से कराए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार झील की लंबाई 1.4 किमी, औसत चौड़ाई 0.45 किमी, गहराई अधिकतम 27.15 मीटर, सबसे ऊंचे स्तर पर झील की क्षमता 12 फीट, झील में योगदान देने वाले नालियों की संख्या 44 है।
शहर में झील में गिरने वालों से नालों से खासकर बारिश में कूड़ा-करकट व मलबा झील तक पहुंच रहा है, नालों के मुहाने की सफाई नहीं हो रही है। रोजाना औसत एक दर्जन स्थानों से सीवर लाइन लीकेज होने या बरसात में ओवरफ्लो होने की शिकायत आम रहती है और सारी गंदगी झील में समाती है, इससे ना केवल झील का पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है बल्कि निर्माण सामग्री का मलबा, कूड़ा करकट आदि से गहराई भी कम हो रही है।
यूएनडीपी की रिपोर्ट ने खोली पोल
नैनीताल: संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ओर से भी 2020 में झील का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। इसरो के माध्यम से प्रशासन ने झील का प्रोफाइल तैयार कराया। रिपोर्ट के अनुसार झील की अधिकतम गहराई 24.6 मीटर जबकि औसतन गहराई नौ मीटर है जबकि 2016 में झील की गहराई सिंचाई विभाग के आंकलन में 27 मीटर थी।
प्रशासन की ओर से झील में गिरने वाले नालों में कचरा फेंकने वालों की पहचान को सीसीटीवी लगाए गए लेकिन वह चंद दिन बाद ठप पड़ गए। विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा है कि झील में 20 मीटर तक गाद भर गई है। पर्यावरणविद प्रो. रावत की याचिका के बाद झील के पारिस्थितिक तंत्र पर बुरा असर डालने वाली मछलियों को हटाकर महाशीर व मिरर सार्क मछलियां डाली गई। बहरहाल गंदगी, कचरा, गाद, अवैध निर्माण के मलबे से नैनी झील के अस्तित्व पर बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।
सिंचाई विभाग की ओर से झील किनारे से मलबा हटाने का मैनुअल काम शुरू किया गया था, लेकिन लगातार बारिश से यह काम बाधित हुआ, नगरपालिका को झील से लगातार गंदगी साफ करने, जल संस्थान को सीवरेज लाइनों को ठीक करने की सख्त हिदायत दी गई है। झील संरक्षण को लेकर प्रशासन पूरी तरह संजीदा है, इस बार झील किनारे का मलबा हटाने की कार्ययोजना तैयार की गई है। - ललित मोहन रयाल, डीएम, नैनीताल।
सुप्रीम कोर्ट के 1995 के आदेश के बाद भी झील व शहर के पर्यावरण संरक्षण के लिए आज तक कमेटी नहीं बनी, अवैध निर्माणों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगा, नालों से कचरा झील तक पहुंच रहा है, अतिक्रमण ने नालों को बंद या संकरा कर दिया है। झील को साफ सुथरा रखने के लिए माल रोड पर यातायात नियंत्रण से लेकर अन्य उपाय सख्ती से लागू करने होंगे। - प्रो. अजय रावत, पर्यावरणविद।
पर्यटकों के दबाव, अवैध निर्माण से भर रही है झील में गाद
नैनीताल: शहर की झील में पर्यटकों के दबाव, अवैध निर्माण तथा नालों के जरिये मलबा, कूड़ा करकट आने से झील में गाद भर रही है। जिससे झील की जलधारण क्षमता व पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। आइआइटी रुड़की के इसी साल के अध्ययन के अनुसार कृत्रिम एरियेशन से झील की स्थिति सुधरी है लेकिन गर्मियों में तलहटी में आक्सीजन कम हो जाती है। झील की ऊपरी सतह पर घुलित आक्सीजन 8.9 एमजीएल और तलहटी में 6.2 एमजीएल दर्ज की गई।
इससे झील की सेहत बिगड़ रही है। इससे मछलियों, अन्य जलीव जीवों के लिए आक्सीजन में कमी होती है। झील व नालों की सफाई के लिए नगरपालिका, सिंचाई विभाग जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञों व शोध के अनुसार झील में भारी मानसून में करीब तीन से दस हजार टन तक गाद या मलबा पहुंचने का अनुमान है। यहां रोजाना 22 से 28 मिट्रिक टन ठोस कचरा पैदा होता है, जिसका हिस्सा नालों से झील में समा जाता है। नालों से सिल्ट ट्रैप और जालियां लगाकर इसको रोका जा सकता है।
