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नैनीताल हाई कोर्ट ने दो परिवारों को दी बड़ी राहत, गुजारा भत्ता बढ़ाया और मुआवजा बरकरार

Published: Thu, 20 Aug 2026 02:30 PM (IST)

नैनीताल हाई कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं: एक में सेना के जवान के बच्चे का गुजारा भत्ता 12 ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, नैनीताल हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों पर अहम निर्णय पारित किया है। एक मामले में कोर्ट ने झारखंड में हादसे में ट्रक चालक की मौत मामले में श्रम न्यायालय के क्षतिपूर्ति के 16 लाख देने के आदेश को सही ठहराया है जबकि दूसरे में एक सेना के जवान की पत्नी को परिवार न्यायालय से 12 हजार मासिक गुजारा भत्ता देने के आदेश को संशोधित कर दिया।

कोर्ट ने मां के साथ किराये के कमरे में रह रहे सेना के जवान के बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतों जैसे खाना, कपड़े, मेडिकल खर्च और दूसरी चीजों के अलावा अब स्कूल में प्रवेश को देखते हुए गुजारा भत्ता बढ़ाकर 25 हजार करने के आदेश पारित किए हैं।

दरअसल चंपावत के परिवार न्यायालय की ओर से 18 अप्रैल 2026 को सेना के जवान की नाबालिग बच्चे के साथ मायके में रह रही पत्नी को मासिक 12 हजार गुजारा भत्ता देने के आदेश पारित किए थे। महिला की ओर से आदेश में संशोधन को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने न्यायाधीश न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ के समक्ष तर्क दिया कि परिवार न्यायालय की ओर से गुजारा भत्ता पूरी तरह से नाकाफी है। परिवार न्यायालय ने सेना के जवान की आय व आर्थिक क्षमता को ठीक से समझे बिना भत्ता तय किया गया है। यह कहा सेना के जवान को लगभग 88,588 रुपये वेतन मिल रहा है। महिला की ओर से शपथपत्र देकर कहा गया कि वह कोई अच्छी नौकरी नहीं करती है।

उसके पास आय का कोई अलग साधन नहीं है। उसे तीन साल के नाबालिग बच्चे के साथ अपना ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। वह किराये के घर में रह रही है। रोजमर्रा की जरूरतों व दूसरी चीजों का खर्च उठाना पड़ता है।

बच्चे को अब स्कूल में प्रवेश दिलाना जरूरी है, पढ़ाई और उससे जुड़े खर्चे काफी बढ़ जाएंगे। यह भी कहा गया है कि रिवीजनिस्ट किराए के घर में रह रही है। पति की आर्थिक क्षमता, उसके व उसके बच्चे की सही जरूरतों से मेल नहीं खाती जबकि सेना के जवान की ओर से कहा गया कि उसकी असल सैलरी 50 हजार है।

बीमा कंपनी की अपील खारिज

नैनीताल: दरअसल तीन मार्च 2021 में काशीपुर ऊधमसिंह नगर के ट्रक चालक कमल सिंह की उत्तर प्रदेश से झारखंड जाते समय में हादसे में मौत हो गई थी। काशीपुर श्रम न्यायालय ने क्षतिपूर्ति से संबंधित दावे पर सुनवाई के बाद बीमा कंपनी को 16 लाख मुआवजा आदेश पारित किया था। इस आदेश को यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी की ओर से याचिका दायर कर हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।

कंपनी ने इस दावे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि कमल की मृत्यु एक स्वाभाविक घटना थी, जिसका उनके कार्य कर्तव्यों से कोई लेना-देना नहीं था। न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने माना कि लंबे समय तक भारी ट्रक चलाने पड़ते थे, जो काम शारीरिक रूप से बहुत थकाने वाला होता है।

कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि ऐसी लंबी ड्यूटी के दौरान स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए खाना खाना आवश्यक काम है। एकलपीठ ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के अंतर्गत ड्राइवर के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए बीमा कंपनी को की याचिका को निरस्त कर कर पीड़ित पक्ष को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया।