नैनीताल, जेएनएन : पांच देशों की संयुक्त प्रयास से बन रही थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) को स्थापित कर पाने में वैज्ञानिकों को पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना होगा। यह विश्व की पहली ऐसी परियोजना है, जिसमें तकनीकी अनुभव दुनिया में किसी भी देश के पास नहीं है। इसको विकसित करने के लिए पहले अनेक शोध करने होंगे, तब अंजाम तक पहुंचाना संभव हो सकेगा।

इंडिया टीएमटी के डिप्टी निदेशक प्रो. एएन रामप्रकाश ने जागरण से विशेष बातचीत में कहा कि इस परियोजना में जटिल व संवेदनशील उपकरण इजाद किए जाने हैं। इसके लिए इंजीनियरों की लंबी टीम बनाई तो गई हैं, लेकिन इस तरह की दूरबीन बनाने का अनुभव नहीं है। हवाई द्वीप में जहां यह दूरबीन स्थापित की जानी है, वहां औसत तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस रहता है। शीतकाल में तापमान शून्य से नीचे पहुंच जाता है। इतने कम तापमान में कार्य कर पाना आसान नहीं है। इसके अलावा पांच देशों के बीच भाषाई ज्ञान व कार्य संस्कृति की समस्या को आपसी तालमेल से ही हल किया जा सकेगा। टाइम जोन, सुरक्षा व स्वास्थ्य की चुनौतियां भी वैज्ञानिकों के सामने होंगी। जिनसे पार पाकर परियोजना को मुकाम तक पहुंचाना होगा। इस परियोजना में देश के चार सौ वैज्ञानिकों के अलावा इंजीनियरों को शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि देश में युवा पीढ़ी को अंतरिक्ष से संबंधित शोध के प्रति जागरूक करने के लिए विज्ञान समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस तरह के प्रोजेक्ट में इंजीनियरों के लिए बेहतर मौके हैं।

जीवन योग्य ग्रह का पता लगाने में मदद करेगी

अंतरिक्ष की थाह पाने में थर्टी मीटर दूरबीन सहायक होगी, जिसमें मुख्यत: संभव है कि पृथ्वी समान जीवन योग्य बाहरी ग्रह का पता लगाया जा सकेगा। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय व कारणों को समझा जा सकेगा। अंतरिक्ष में विद्यमान पदार्थों को पहचाना जा सकेगा। इस दूरबीन से अदृश्य पदार्थों व शक्तियों समझा जा सकेगा। ब्रह्मांड के फैलाव को जाना जा सकेगा। इसके अतिरिक्त ब्लैक होल व क्वेजार जैसे रहस्यों को समझने में मददगार साबित होगी। आकाशगंगाओं के जन्म को समझा जा सकेगा। सुदूर की आकाशगंगाओं की रचना व उनमें मौजूद पदार्थों को समझने में सहायक होगी।

ये हैं दुनिया की 10 बड़ी दूरबीनें

थर्टी मीटर टेलीस्कोप वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी परियोजना है। इससे पहले 2002 चीली में 6.5 मीटर, 1998 माउंट होपकिंग में 6.5, 2000 चीली में 8.1, 1998 चीली में 8.2, 1999 हिलो में 8.2, 2004 एमटीग्रहम में 8.4, 2005 साउथ अफ्रीका में 9.2, 1993 वाइमीआ 10, 1996 डेविस माउंटेन 10 व 2009 में 10.4 मीटर की दूरबीन स्थाापित की जा चुकी हैं।

नासा की दूरबीन दस गुना अधिक साफ चित्र लेगी

30 मीटर व्यास ऑप्टिकल दूरबीन यानी टीएमटी नासा द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित की गई दूरबीन हब्बल से 12 गुना अधिक स्पष्ट चित्र लेने में सक्षम होगी। यह वर्तमान में मौजूद दूरबीनों के मुकाबले तीन गुना अधिक बड़ी होगी। यह दूरबीन अंतरिक्ष की अबूझ पहेलियों का हल खोजने में मददगार साबित होगी। वर्ष 1610 में पहली दूरबीन का निमार्ण हुआ। उसके बाद से अभी तक हजारों छोटी बड़ी दूरबीनों का निर्माण अनवरत जारी है। ऑप्टिकल दूरबीन में दस मीटर व्यास तक दूरबीन स्थापित की जा चुकी हैं। अब जरूरत के मुताबिक तीस मीटर व्यास की दूरबीन स्थापित करने का कार्य हवाई द्वीप में चल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दूरबीन अत्याधुनिक उपकरणों से लेस होगी। जिसमें एडॉप्टिव व ऑप्टिकल उपकरण लगाए जाएंगे। इनके अलावा वाइल्ड फील्ड स्पेक्ट्रोमीटर व इंफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर अत्याधुनिक उपकरण स्थापित किए जाने हैं। इन उपकरणों से अंतरिक्ष के अथाह सागर की थाह पाना आसान हो जाएगा। इस परियोजना में दुनिया के पांच देश क्रमश: भारत, अमेरिका, कनाडा, जापान व चायना शामिल हैं। इस परियोजना में भारत की दस फीसदी की भागीदारी है।

सौ से अधिक खगोलविद कार्यशाला में होंगे शामिल

आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के खगोल वैज्ञानिक डा. शशिभूषण पांडे के अनुसार कार्यशाला में देशभर के 100 से अधिक वैज्ञानिक एटीआइ में जुट रहे हैं। जिनमें इसरो बेंगलुरु, आयुका पूना, आइआइए बेंगलुरु, डीयू व जेएनयू दिल्ली व टीआरएफ मुंबई के खगोल वैज्ञानिक शामिल हैं।

देश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी टीएमटी की सफलता

एरीज के कार्यवाहक निदेशक डा. वहाबउद्दीन का कहना है कि यह परियोजना दुनिया की बड़ी परियोजनाओं में शामिल है। जिसकी सफलता देश को अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि से नवाजेगी। यह कार्यशाला टीएमटी के निर्माण कार्य को आसान बनाएगी।

13 हजार करोड़ की लागत से बनाई जा रही दूरबीन

आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के निदेशक डॉ. वहाबउद्दीन ने कहा कि अमेरिका के हवाईद्वीप में स्थापित की जा रही 30 मीटर व्यास की दूरबीन 13 हजार करोड़ की लागत से बनाई जा रही है। जिसमें भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी की है। जिसमें देश के वैज्ञानिकों को 20 प्रतिशत शोध करने का अवसर मिलेगा। उन्‍होंने बताया कि परियोजना में रिसर्च व डेवलेपमेंट का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है। यह दूरबीन अमेरिका के हवाई द्वीप के मोनेकिया में स्थापित की जाएगी। दूरबीन स्थापित किए जाने को लेकर पूर्व में चला विवाद अब समाप्त हो चुका है। परियोजना की साझेदारी में भारत के कई महत्वपूर्ण कार्य हैं। जिसमें मिरर बनाना सबसे अहम है। शुरुआती चरण में दस मिरर बनाने का कार्य निजी कंपनी एल एंड टी को सौंपी गई है। जांच के बाद ही मिरर बनाने की आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। परियोजना को 2030 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस मौके पर इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एसट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजि‍क्स आयुका पुणे के प्रो. अजीत केमभावी ने कहा कि इस परियोजना में एरीज के अलावा आईआईए बंगलुरू व आयुका पुणे मुख्य रूप से शामिल हैं।  इनके अलावा कई अन्य संस्थान व निजी कंपनियों को शामिल किया गया है। शामिल देशों में अमेरिका का हिस्सा सबसे बड़ा होने के चलते दूरबीन से 41, भारत 20, जापान 16, कनाडा 12 व चायना 11 प्रतिशत शोध कर सकेगा। इस अवसर पर प्रो. एस श्रीराम, प्रो. अन्नपूर्णी सुब्रमणयम, प्रो. पी श्रीकुमार, प्रो. रामसागर व डॉ. एसबी पांडे मौजूद थे।

नैनीताल में शुरू हुआ प्रोजेक्‍ट पर मंथन

दुनिया का मेगा प्रोजेक्ट थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) के निर्माण को लेकर देश के वैज्ञानिकों का मंथन नैनीताल में शुरू हो गया है। भारत समेत पांच देशों की इस संयुक्त परियोजना को भविष्य के विज्ञान की जननी माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह टेलीस्कोप अंतरिक्ष के गूढ़ रहस्यों को उजागर करने में अहम भूमिका निभाएगा। साथ ही इससे युवा पीढ़ी वैज्ञानिक शोधों को लेकर आकर्षित होगी। गुुरुवार को डॉ आरएस टोलिया उत्तराखंड प्रशासन अकादमी (एटीआइ) के ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. केएस राणा ने किया। उन्होंने इस परियोजना को अंतरिक्ष में शोध की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण करार देते हुए भरोसा जताया कि परियोजना के माध्यम से देश के वैज्ञानिक वैश्विक परिदृश्य में भारत की मेधा के उच्च मापदंड के उदाहरण बनेंगे। आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज की टीएमटी साइंस एंड इंस्ट्रूमेंट्स कार्यशाला में देशभर से आए वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए प्रो. राणा ने कहा कि टीएमटी दुनिया की न केवल मेगा परियोजना है, बल्कि युवा वैज्ञानिकों को भविष्य में अंतराष्टï्रीय स्तर के शोध कार्यों की राह आसान बनाएगी।

Posted By: Skand Shukla

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप