भीमताल, जागरण संवाददाता : दारमा घाटी का रंग समुदाय अपने पूर्वजों की विरासत को संजो रहा है। उत्‍तराखंड और तिब्‍बत से लेकर नेपाल तक पूर्वजों द्वारा बनाए गए धरोहरों को खोजकर संरक्षति किया जा रहा है। तिब्‍बत से लेकर नेपाल तक और उत्‍तराखंड में बनाए ऐसे सौ से अधिक भवन चिन्‍हति किए जा चुके है। कई भवन तो अब भी यथास्‍थ‍िति में हैं। 

दारमा घाटी की दांतु गांव प्रसिद्ध महिला व्यापारी जसूली देवी ने की वर्ष 1870-1880 के बीच में विभिन्न व्यापारिक मार्गों पर करीब 350 धर्मशालाओं का निर्माण कराया था। दारमा निवासियों की संस्था रंग कल्याण समिति ने इन 350 धर्मशाला में से 130 धर्मशालाओं को खोजने में सफलता प्राप्त की है। कहीं भवन खंडहर हो चुके हैं तो कहीं अब भी खासी अच्छी हालत में हैं। संस्था को 25 धर्मशाला नेपाल के पाटना बैतड़ी और उससे लगे क्षेत्र में मिले हैं तो भारत-तिब्बत सीमा पर भी एक धर्मशाला खोजी गयी है। 

रंग कल्याण समिति के मुताबिक यह सभी धर्मशाला व्यापारिक रूट पर हैं। स्थानीय इतिहासकारों के मुताबिक धर्मशाला हर दस से बारह किमी की दूरी पर बनाई गयी थी। मतलब एक दिन में जितना पैदल चला जा सकता था उतनी दूरी पर धर्मशाला का निर्माण कराया गया था। रंग संस्था के मुताबिक भवाली, नैनीताल, और अल्मोड़ा जनपद में सबसे अधिक धर्मशालाएं मिली हैं। अभी खोज का कार्य जारी है। इधर रंग संस्था ने प्रशासन और सरकार से इस प्रकार की धरोहर को पुरात्तव विभाग को सौंपने व उसके संरक्षण की मांग की है।

जसूली देवी ने ही कराया था निर्माण

दारमा घाटी की प्रसिद्ध महिला व्यापारी जसूली देवी के बारे में मान्यता है कि वह बहत अमीर थीं। प्रतिदिन सवेरे गंगा में सोने के सिक्के दान करती थीं। वहीं एक बार अंग्रेजों के वहां पहुंचने पर अंग्रेजों और स्थानीय लोगों ने जसूली देवी से इस प्रकार का धन बर्बाद ना करके समाज सेवा में लगाने का अनुरोध किया। जिसके बाद उन्‍होंने धर्मशालाओं का निर्माण कराया। जबकि अब तक यह माना जाता था कि अंग्रेज कमि‍श्नर रामजे ने इनका निर्माण कराया होगा। पर अब तक के शोध में अंग्रेज कमिश्नर रामजे के द्वारा निर्मित किये जाने की पुष्टि नहीं हो पाई है। 

इन रूटों में मिली हैं सर्वाधिक धर्मशालाएं

जसूली देवी द्वारा बनाई गई धर्मशालाएं अल्मोड़ा से हल्द्वानी, अल्मोड़ा से भिकियासैंण, भिकियासैंण से रामनगर, भिकियासैंण से गढ़वाल, अल्मोड़ा से बागेश्वर, अल्मोड़ा से लोहाघाट, अल्मोड़ा से बेनीनाग थल, पिथौरागढ़ से धार्चुला, दारमा, पिथौरागढ़ से टनकपुर और टनकपुर से महेन्द्र नगर में बनवाई गई थीं। धर्माशालाएं तिब्‍बत और नेपाल में भी मिली हैं। 

पुरात्तव धरोहर घोषित करने की मांग 

रंग कल्याण समिति के समन्‍वयक रवि पतियाल समन्वयक ने बताया कि रंग कल्याण समिति इन धर्मशालाओं की जीर्ण शीर्ण हालत को सुधारने का प्रयास कर रही है। अभी वर्तमान में हमने पिथौरागढ़ के सतगड़ और काकड़ी घाट के पास धर्मशालाओं में कार्य करवाना प्रारंभ कराया है। यह धर्मशाला 8 से 10 कमरों के बीच हुआ करती थी। रंग कल्याण समिति काफी समय से शासन से इन धर्मशालाओं को संरक्षित और पुरात्तव धरोहर घोषित करने की मांग करते आ रही है।

यह भी पढें 

वित्तीय संकट से उबरने के लिए बाजार दर से आवासों का किराया वसूलेगी नैनीताल नगरपालिका 

बीते साल आर्थिक संकट से जूझा नैनीताल जू, अन्य वर्षों की तुलना में 26 फीसदी ही हुई आय 

Edited By: Skand Shukla

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट